Wednesday, 30 August 2017

नोटबंदी का लेखा-जोखा : 5 फायदे और 5 नुकसान


नोटबंदी के बाद रिजर्व बैंक ने पहली बार व्‍यापक रूप में आंकड़े जारी किए हैं। आरबीआई ने बुधवार को अपनी एनुअल रिपोर्ट जारी कीजिसके बाद नोटबंदी को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। जहां सरकार इस रिपोर्ट के आधार पर अपनी सफलता गिना रही हैवहीं विपक्ष ने नोटबंदी पर फिर से सवाल खड़े किए हैं। हालांकि एक बात तय है कि नोटबंदी से जहां देश को कई फायदे हुए हैं वहीं कुछ नुकसान भी उठाने पड़े हैं।

आखिर क्‍या था नोटबंदी का लक्ष्‍य

सरकार ने नोटबंदी के दौरान ब्‍लैक मनी पर रोक,आतंकी फंडिंग और नकली नोटों की समस्‍या खत्‍म होने का भरोसा दिलाया था। हालांकि इन मुद्दों पर कितनी सफलता मिली यह कुछ समय बीतने के बाद ही तय होगा।  

इकोनॉमिस्‍ट की नजर में फायदे

ज्‍यादातर इकोनॉमिस्‍ट का मानना है कि इससे पहला फायदा टैक्‍सपेयर्स का दायरा बढ़ने के रूप में सामने आया है। सरकार का इरादा ब्‍लैकमनी को सामने लाना था। जब सारा पैसा सिस्‍टम में आ गया हैतो इसे ब्‍लैकमनी को एक तरह से खत्‍म ही माना जा सकता है। लोगों ने अपना पैसा बैंकों में जमा किया है और बाद में टैक्‍स देना शुरू किया है। सरकार को यह टैक्‍स अब हरदम मिलेगायानी फायदा मिलता ही रहेगा। आंकड़ों के अनुसार पिछले साल 91 लाख नए टैक्‍सपेयर्स बढ़े हैं। इसके पिछले साल की अपेक्षा इनमें 80 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई है।

कर्ज सस्‍ता मिलने का रास्‍ता खुला

दूसरा फायदा बैंकों में अचानक जमा राशि बढ़ने के रूप में सामने आया है। इसके चलते लोगों को कर्ज सस्‍ता मिलने का रास्‍ता खुला है। हाउसिंग लोन पर सभी बैंकों ने अपनी कर्ज की दर को घटा दिया है। पिछले साल हाउसिंग लोन की दरें जहां 10.5 से लेकर 12 फीसदी के बीच थीं वहीं यह अब 8 से 9 फीसदी के बीच आ चुकी हैं।

महंगाई पर लगाम लगी

तीसरा फायदा महंगाई घटने के रूप में सामने आया है। इकोनॉमिस्‍टों के अनुसार ब्‍लैकमनी से लोग अनापशनाप खरीदारी करते हैंजिससे चीजों के दाम बढ़ जाते हैं। लेकिन पूरा पैसा सिस्‍टम में आने से ऐसी चीजें रुकी हैं,जिससे महंगाई पर लगाम लगी है। जहां नवंबर 2016 में यह दर 3.63 फीसदी थीजो जुलाई 2017 में घट कर 2.36 फीसदी पर आ गई।

कैशलैस ट्रांजेक्‍शन में इजाफा

इसके अलावा चौथा फायदा सोसाइटी में कैशलैस ट्रांजेक्‍शन बढ़ने के रूप में सामने आया है। नोटबंदी से सरकार लगातार कैशलैस ट्रांजेक्‍शन बढ़ाने का प्रयास कर रही है। इससे जहां पूरा कारोबार ऑन पेपर हो रहा हैवहीं बाजार में नोटों की जरूरत कम हो रही है। इससे टैक्‍स चोरी रोकने में मदद मिलेगी। रिजर्व बैंक के डाटा के अुनसार नवंबर 2016 से मार्च 2017 के बीच 33 फीसदी ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन बढ़ा है।

नकली नोट छापना मुश्किल

जानकारों की राय में नोटबंदी से पांचवां बड़ा फायदा नकली नोटों को रोकने में मिला है। आतंकी फंडिंग में इन नोटों का बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल होने का आरोप था। सरकार का दावा है कि नोटबंदी के बाद से आंतकी फंडिंग पर ब्रेक लग गया है। 500 और 2000 के नए नोट में सिक्‍युरिटी फीचर बढ़ाए गए हैं। इसके चलते नए नोट नकली छापना कठिन हो रहा है वहीं पुराने नोट बंद होने से यह समस्‍या फिलहाल पूरी तरह से रुक गई है।


नोटबंदी के ये हुए नुकसान


जहां कुछ इकोनॉमिस्‍ट फायदे गिना रहे हैंवहीं इसके नुकसान भी गिनाए जा रहे हैं। जानकारों की राय में पहला नुकसान कंपनियों के कारोबार पर पड़ा। इससे कंपनियों का प्रॉफिट घटा। रेटिंग एजेंसी ICRA की रिपोर्ट के अुनसार वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही में 448 कंपनियों की ग्रोथ में गिरावट दर्ज की गई है। यह इसके एक साल पहले इसी तिमाही में 8.3 फीसदी से घटकर 5.3 फीसदी पर आ गई है। यही नहीं कंपनियों का शुद्द लाभ भी 1.80 फीसदी से घटकर 15.7 फीसदी पर आ गया।

लाखों लोगों की गई नौकरी

वहीं इससे जुड़ा दूसरा नुकसान नौकरियों में कमी के रूप में आया। कंपनियों का जब कारोबार प्रॉफिट घटा तो उन्‍होंने लोगों की छंटनी की। जिससे लाखों लोगों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। CMIE के अनुसार नोटबंदी के बाद से करीब 15 लाख नौ‍करियां गई हैं।

जीडीपी में गिरावट

इसका तीसरा असर देश की जीडीपी में गिरावट के रूप में सामने आया। पिछले साल देश की जीडीपी में गिरावट दर्ज की गई। CSO के डाटा के अनुसार 2016-17 में जीडीपी गिरकर 6.6 फीसदी पर आ गई। यह दर 2015-16 के दौरान 7 फीसदी के ऊपर थी।

ब्‍याज दरों में कमी

चौथा नुकसान लोगों को बैंकों में सेविंग अकाउंट में ब्‍याज दरों में कमी के रूप में सामने आया है। देश में अभी तक कभी भी सेविंग अकाउंट में ब्‍याज दरें नहीं घटीं थींलेकिन अब ज्‍यादातर बड़े बैंक अपने सेविंग में ब्‍याज दरों को आधा फीसदी घटा कर 3.5 फीसदी कर चुके हैं।

गंवानी पड़ी जान

वहीं पांचवां नुकसान ऐसा रहा है जिसकी भरपाई संभव नहीं है। देश में नोटबंदी के दौरान कुछ लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी। यह लोग बैंकों से नई करेंसी लेने के लिए लाइनों में लगे थेजिस दौरान यह हादसे सामने आए। मीडिया रिपोर्ट के अुनसार करीब 90 से ज्‍यादा जानें इस दौरान गईं। 

Thursday, 10 August 2017

गाली देने के लिए ‘सराहा’ सबसे शानदार

आज लगभग हर ऑफ़िस जाने वाला इंसान अपने बॉस की डांट से परेशान रहता है। यही वजह है कि दोनों के बीच रिश्‍तों में कड़वाहट बनी रहती है। कई कर्मचारी तो ऐसे भी होते हैं जिन्‍हें अपने बॉस पर बरसने की इच्‍छा होती है लेकिन जॉब की मजबूरी की वजह से बर्दाश्‍त कर जाते हैं। इसी से परेशान होकर सउदी अरब के सॉफ्टवेयर डेवलेपर जैनुल अलेबदीन तौफिक ने एक ऐप को लॉन्‍च किया।


30 करोड़ बार डाउनलोड
28 साल के तौफिक को इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका ऐप दुनियाभर में फेमस हो जाएगा। करीब एक महीने पहले लॉन्च हुए इस ऐप को दुनियाभर में करीब 30 करोड़ से ज्‍यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है। वहीं भारत में यह ऐप स्टोर पर टॉप ट्रेंड कर रहा है।

बॉस पर भड़ास निकालना मकसद
इस ऐप का नाम ‘सराहा’ है। यह अरबी का शब्‍द है जिसका हिंदी अर्थ ईमानदारी या स्‍पष्‍टता होता है। फाउंडर जैनुल अलेबदीन तौफिक ने फरवरी 2017 में इसका वेबसाइट लॉन्च किया लेकिन जुलाई में इसका ऐप भी बनाया गया। तौफिक ने एक इंटरव्‍यू में बताया कि इस ऐप को बनाने का मकसद उसे अपने बॉस पर अपनी भड़ास निकालना था।

भारत से खास कनेक्‍शन
वेस्‍टर्न सउदी अरब के मेडिना शहर के रहने वाले ऐप के फाउंडर तौफिक ने किंग फाहद यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम से कंम्‍प्‍यूटर साइंस में बैचलर डिग्री की पढ़ाई की है। तौफिक ने भारत की आईटी कंपनी विप्रो लिमिटेड में बतौर जूनियर कंसल्‍टेंट की नौकरी भी की है। इसके अलावा उन्‍होंने सउदी की एक प्राइवेट कंपनी में बिजनेस सिस्‍टम एनालिसिस का जॉब किया।      

इस ऐप की खासियत
इस ऐप के जरिए आप अपने प्रोफाइल से लिंक किसी भी व्यक्ति को मैसेज भेज सकते हैं। लेकिन सबसे दिलचस्‍प पहलू यह है कि मैसेज पाने वाले को यह पता नहीं चलेगा कि ये मैसेज किसने भेजी है। जाहिर है, इसका जवाब भी नहीं दिया जा सकता और यही कारण है कि ये ऐप लोगों के बीच बहुत तेज़ी से लोकप्रिय होता जा रहा है।

कैसे काम करता है ऐप
सबसे पहले अपने स्‍मार्टफोन में प्ले स्टोर से ऐप को डाउनलोड करना होगा। इसके बाद यूजर को रजिस्ट्रेशन कराना होता है। इसके लिए ईमेल आईडी देनी होगी। रजिस्टर्ड होने के बाद इसका लिंक फेसबुक समेत दूसरे सोशल नेटवर्क पर पोस्ट करने का ऑप्शन मिलता है। इस लिंक को पब्लिक कर सकते हैं या प्राइवेट मैसेज के जरिए किसी को भेज सकते हैं। जैसे ही लिंक के जरिए कोई आपको मैसेज भेजता है ऐप में नोटिफिकेशन मिलेगा। हालांकि मैसेज भेजने वाले शख्‍स के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाएगी।  

Monday, 7 August 2017

चोटी नहीं, पंख बचाइए...

पिछले कुछ दिनों से दो खबरों ने लोगों के जेहन में आतंक फैला रखा है। पहली खबर मॉर्डन दौर के इंटरनेट गेम ब्‍लू व्‍हेल की वजह से मौत की जद में जा रहे बच्‍चों से जुड़ी है तो दूसरी खबर महिलाओं की रहस्‍यमयी चोटी काटने की है। इन दोनों खबरों ने लोगों की सोच के डोर को दो छोर पर ला खड़ा किया है। इंटरनेट गेम के जरिए बच्‍चों की मौत ने जहां आधुनिकता को नई चुनौती दे दी है तो वहीं चोटी काटने की घटना ने मॉर्डन इंडिया के मुहिम को सदमा पहुंचा दिया है। इंटरनेट गेम के जरिए जान जाने की घटना किसी भी मायने में कम नहीं हो सकती लेकिन हां, उसे कंट्रोल करने के तमाम उपाय तलाशे जा सकते हैं। लेकिन क्‍या चोटी काटने की घटना को भी उसी की तरह है। मेरा मानना है शायद नहीं। ये सिर्फ चोटी काटने की घटना भर नहीं है, ये लड़कियों या महिलाओं के पर कतरने का जरिया भी बन निकला है। दरअसल, महिलाएं इस भोथरे समाज में लोथड़े से ज्‍यादा नहीं हैं। उनके हर कदम हमारी मर्दनागी को चुनौती देने का काम करती है। तभी तो हवस भरी निगाहों से ही रेप कर दिया जाता है और उससे भी जी न भरे तो जबरदस्‍ती भी कर लेते हैं। दरअसल, महिलाओं को घर से बाहर निकलने नहीं देना और चारदिवारी में समेट कर रखना ही हमारी जीत है। अगर निकले भी तो पूरी तरह से देहाती बनकर ही निकले तभी भला होगा क्‍योंकि मॉडर्न लुक पचाने की हमारे अंदर पाचन शक्ति नहीं है। ऐसे में क्‍यों न ऐसा स्‍वांग रचा जाए, जिसमें डर का माहौल बन जाए और फिर वह घर के अंदर दुबकी रहे। जरूरी नहीं कि चोटी काटने की हर घटना के पीछे का मकसद यही हो लेकिन अधिकतर में यही स्थिति है। 

  यह स्थिति किसी जानलेवा गेम से कहीं ज्‍यादा खतरनाक है। इस स्‍वांग के जरिए महिलाओं का दम घोटनें का काम किया जा रहा है। चोटी कौन काट रहा है, क्‍यों काट रहा है, इसको गंभीरता से लेने की बजाए मजाक का बिषय बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर फनी तस्‍वीरें शेयर की जा रही हैं। इस मजाक के जरिए मामले की गंभीरता को दबाया जा रहा है। गौर से समझिए,  इशारों में महिलाओं और लड़कियों को धमकाया जा रहा है। अगर इस बेहूदा मजाक का हिस्‍सा आप भी हैं तो निश्चित ही महिलाओं की आजादी को कैद करने का काम कर रहे हैं। सरकारें मौन देख रही हैं, मौन देखेंगी भी क्‍योंकि उन्‍हें भी आपके पंख काटने में ही शांति मिलती है। इस सोशल आबोहवा में गुमराह न होइए, इस साजिश को बेनकाब कीजिए और चोटी नहीं अपने पंख को बचाइए।