Friday, 6 March 2015

क्रिकेट कुंभ 2015

विश्वकप 2015 


पैसों की होगी बरसात
2015 का विश्वकप क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए बड़ी मोटी राशि लेकर आ रहा है। इसे आयोजित करने वाली संस्था आईसीसी ने इस बार इनामी राशि बढ़ाकर एक करोड़ अमेरिकी डॉलर (61 करोड़ रुपये) कर दी है। यह राशि टीमों के प्रदर्शन पर निर्भर करेगी। बंटवारा कुछ इस तरह से होगा कि विजेता टीम को मिलेगी 39 लाख 5 हजार डॉलर की रकम और उपविजेता को 17 लाख 50 हजार डॉलर की रकम। हर ग्रुप मैच जीतने पर 45 हजार डॉलर की मोटी रकम मिलेगी। इसका मतलब यह हुआ कि जो टीम विश्वकप जीतेगी, उसे कुल 42 लाख 45 हजार डॉलर (लगभग 26 करोड़ रुपये) मिलेंगे। यानी जीतने वाली टीम का हर खिलाड़ी करोड़पति हो जाएगा। क्रिकेट में इतनी बड़ी राशि पहली बार रखी गई है। इसके बावजूद विश्व कप फुटबॉल के मुकाबले यह छोटी रकम है। पिछले विश्व कप फुटबॉल में कुल राशि थी 57 करोड़ 60 लाख डॉलर और विजेता टीम को मिले थे साढ़े तीन करोड़ डॉलर यानी लगभग 214 करोड़ रुपये।

छक्का लगाना आसान नहीं
इस विश्वकप में बाउंड्री लाइन उम्मीद से करीब 20 मीटर बड़ी नजर आएगी। आईसीसी ने इस बारे में फैसला ले लिया है। आमतौर पर बाउंड्री 70 मीटर के करीब होती है लेकिन इस बार बाउंड्री लाइन 90 मीटर के करीब होगी। इतना ही नहीं विश्वकप में बल्ले की साइज में भी बदलाव किया जा सकता है। आईसीसी बल्ले की मोटाई की सीमा तय करने पर विचार भी कर रही है। मौजूदा नियम के अनुसार बल्ले की लंबाई 38 इंच और चौड़ाई 4.25 इंच होती है। 


इतिहास रचने को तैयार महा मुकाबला 
भारत और पाकिस्तान के बीच एडिलेड में 15 फरवरी को होने वाला विश्व कप क्रिकेट का मैच इस खेल के इतिहास में सबसे अधिक देखे जाने वाला मैच बन सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार इसे एक अरब से ज्यादा दर्शक देख सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रुप बी का यह मैच इन दोनों टीमों के बीच ही 30 मार्च 2011 को मोहाली में खेल गए विश्व कप के सेमीफाइनल मैच का रिकॉर्ड तोड़ सकता है। उस मैच को करीब 98 करोड़ 80 लाख लोगों ने देखा था। कहा गया है कि इस मैच के सभी टिकट छह महीने पहले ही बिक गए हैं। पाकिस्तान अभी तक विश्व कप में कभी भारत से नहीं जीत पाया है। इन दोनों टीमों के बीच विश्व कप में पहला मुकाबला 1992 में हुआ था जिसकी मेजबानी भी ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने की थी। भारत ने तब से पाकिस्तान के खिलाफ विश्वकप में जो पांच मैच खेले उन सभी में उसने जीत दर्ज की है।  वहीं टूर्नामेंट के टिकटों की बिक्री की संख्या करीब 10 लाख हो गई है। अब तक 7,50,000 से ज्यादा टिकटें बिक चुकी हैं।

आईसीसी के लोक लुभावन ऑफर
सभी पूल मैचों के लिए बच्चों के टिकट महज 5 डॉलर यानी करीब 270 रुपये से मिलेंगे तो बड़ों के लिए टिकट की कीमत 20 डॉलर से शुरू होगी। मतलब यदि एक परिवार के चार लोग (दो बच्चों समेत) मैच देखेंगे तो आपको चार टिकट के लिए महज 50 डॉलर चुकाने होंगे। अगर 20 डॉलर प्रति टिकट गिना जाए तो यह राशि 80 डॉलर बनती है। 14 फरवरी से टिकटों की सामान्य बिक्री शुरू हो जाएगी। आईसीसी की तरफ  से पूरे टूर्नामेंट (14 फरवरी से लेकर 29 मार्च 2015 तक) के लिए ट्रेवल पैकेज का ऑफर भी दिया है। इतना ही नहीं 14 फरवरी को वेलेंटाइन स्पेशल में प्रेमी जोड़े के लिए भी खास ऑफर है।  इसके अलावा आईसीसी नए एप के जरिए भी दर्शकों को टूर्नामेंट से जोड़ना चाहती है। वहीं टूर्नामेंट को सफल बनाने के लिए सोशल साइट्स पर भी आईसीसी की सक्रियता बढ़ गई है।     


सट्टा बाजार का खेल शुरू
विश्वकप शुरू होने से पहले ही सट्टा बाजार में खेल शुरू हो गया है। सटोरियों की पहली पसंद ऑस्ट्रेलिया है। सट्टा बाजार में इस टीम का भाव सबसे कम 2.40 रुपये है। सटोरियों के अनुसार इस टीम को घरेलू माहौल का काफी फायदा मिलेगा और इन दिनों इस टीम का प्रदर्शन भी जबरदस्त है। सटोरियों की नजर में अब तक एक भी विश्वकप नहीं जीत सकी टीम दक्षिण अफ्रीका का स्थान दूसरा है। दक्षिण अफ्रीकी टीम फॉर्म में है और इस टीम की भी जीतने की संभावना है। सट्टा बाजार में इस टीम का भाव 4.30 रुपये है। सटोरियों ने तीसरे स्थान पर न्यूजीलैंड को रखा है। इस टीम का प्रदर्शन भारत से अच्छा है और इसे भी घरेलू माहौल का लाभ मिलने की उम्मीद है। सट्टा बाजार में न्यूजीलैंड का भाव 5.30 रुपये है। सट्टा बाजार में चौथे स्थान पर भारतीय टीम है। इस टीम का भाव 6.30 रुपये है। वहीं पांचवें नंबर पर इंग्लैंड की टीम है जबकि श्रीलंका का छठा स्थान है। पाकिस्तान का स्थान सातवां हैं। यानी इस बार भी पाकिस्तान की उम्मीद काफी कम है। 

आईसीसी की ऐसे होगी कमाई
आईसीसी को विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेंट के टीवी प्रसारण अधिकार से दो अरब डॉलर मिलेंगे। उसने इस प्रसारण के अधिकार ईएसपीएन स्टार स्पोर्ट्स और स्टार क्रिकेट को बेच दिए हैं। बताया जा रहा है कि अकेले भारतीय कंपनियां और वे कंपनियां, जो भारत में काम कर रही हैं, लगभग 1,200 करोड़ रुपये के विज्ञापन देंगी। इस मोटी कमाई के अलावा वह मैदान में लगाए जाने वाले विज्ञापनों से होनी वाली आय का भी हिस्सा लेगी। इसके अलावा प्रायोजक कंपनियां भी इसमें मोटी रकम देंगी। टिकटों की बिक्री से भी उसे तगड़ी कमाई की उम्मीद है। टिकटों की कीमत भी कोई कम नहीं है। उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फाइनल मैच देखने के लिए 125 ऑस्ट्रेलियन डॉलर (6,134 रुपये) से लेकर 395 डॉलर (19,384 रुपये) तक की कीमत चुकानी पड़ेगी। फाइनल में लगभग 70 हजार लोगों के आने की उम्मीद है। 


विश्वकप 2015 : अहम बात  
14 : टीमें क्रिकेट के इस महाकुंभ में हिस्सा ले रही हैं।
210 : खिलाड़ी कुल 2015 विश्वकप में हिस्सा ले रहे हैं।
44 : दिन तक चलने वाले टूर्नामेंट के दौरान कुल मिलाकर 49 मैच खेले जाएंगे।
14: शहरों में मैचों का आयोजन किया जाएगा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के । 
05 :  खिलाड़ी खेल रहे हैं, जोकि इससे पहले विश्वकप विजेता टीम का हिस्सा रह चुके हैं। (धोनी, कोहली, रैना, माइकल क्लार्क और शेन वाटसन)

  -  विश्वकप 2015 का फाइनल मैच रविवार, 29 मार्च, 2015 को मेलबर्न में खेला जाएगा। 
  -  फाइनल मैच के टाई रहने या नतीजा नहीं निकलने की सूरत में दोनों टीमें संयुक्त विजेता घोषित की जाएंगी।
   -  सबसे महंगी टिकट 22, 000 रुपये की है।
   - सबसे सस्ती टिकट 270 रुपये की रखी गई है।
   -  बिना कोई मैच हारे टूर्नामेंट जीतने की स्थिति में विजेता टीम की इनामी राशि बढ़ जाएगी।
   - करीब 1, 500 नेट गेंदबाजों का इस्तेमाल किया जाएगा, जो खिलाड़ियों को अभ्यास कराएंगे।
   - अनुमान है कि एक अरब से भी ज्यादा लोग टीवी पर टूर्नामेंट देखेंगे
    - विश्वकप के आयोजन में न्यूजीलैंड सरकार 50 लाख न्यूजीलैंड डॉलर खर्च कर रही है।

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जब पहली बार हम बने विश्वविजेता

गावस्कर टोटके से बने चैंपियन 
भले ही 1983 का विश्वकप टीम इंडिया ने जीता लेकिन इस टूर्नामेंट में सुनील गावस्कर का प्रदर्शन बहुत ही खराब था। शुरुआती दो मैच खेलने के बाद गावस्कर को टीम से बाहर बिठा दिया गया।  गावस्कर को हटाने के बाद टीम दो मैच खेली। पहला ऑस्ट्रेलिया और दूसरा वेस्टइंडीज के खिलाफ और दोनों ही मैच बड़े अंतर से हार गई। टीम प्रबंधन ने  गावस्कर को फिर से मौका दिया और भारत वह मैच जीत लिया। तभी से सभी को ये लगने लगा कि गावस्कर टीम के लिए लकी हैं और फिर ‘अचूक टोटका’ मैच दर मैच काम आता गया। इसके बाद गावस्कर टीम से बाहर नहीं किए गए और टीम इंडिया टूर्नामेंट जीतने तक एक भी मैच नहीं हारी। 1983 विश्वकप के दौरान गावस्कर ने छह मैच खेले और रन बनाए केवल 59 । उनका औसत 9.83 और उच्चतम स्कोर 25 था। 

गरीब बीसीसीआई की दास्तां
बेशक बीसीसीआई आज दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड है। लेकिन 1983 में इस बोर्ड के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि विश्वविजेता टीम को इनाम दे सके। बोर्ड के इस रवैये से विश्व विजेता टीम के खिलाड़ियों का गुस्सा फूट पड़ा। सुनील गावस्कर सबसे ज्यादा नाराज थे। उस वक्त एक अखबार को दिए इंटरव्यू में गावस्कर ने कहा था कि बोर्ड को चाहिए कि वो हर खिलाड़ी को 1-1 लाख रुपये दें। ऐसे में खिलाड़ियों की मदद के लिए आगे आईं लता मंगेशकर। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में खिलाड़ियों के सम्मान में एक लाइव कांसर्ट आयोजित हुआ। हजारों की भीड़ के बीच लता मंगेशकर ने एक शानदार गीत गाया। इस कांसर्ट से हुई कमाई के बाद भारतीय टीम के खिलाड़ियों को 1-1 लाख रुपये दिए गए जो उस जमाने में बड़ी रकम थी।

चबाया भारत के अपमान को
विश्वकप 1983 में क्रिकेट की जानी-मानी मैग्जीन विजडन के संपादक डेविड फ्रिथ ने अपने लेख में भारतीय टीम का अच्छा-खासा मजाक उड़ाया। जिसमें कहा कि भारतीय टीम सिर्फ  विश्वकप का दस्तूर निभाने इंग्लैंड आई है। ये टीम वनडे क्रिकेट को अपना नहीं पाई है और इस टीम को टूर्नामेंट से नाम वापस ले लेना चाहिए। इतिहास ने करवट लिया और फाइनल में वेस्टइंडीज को हरा भारत नया विश्वविजेता बना। जीत के बाद भारतीय टीम जश्न में डूब गई। भारतीय टीम का ये जश्न विजडन के संपादक डेविड फ्रिथ को झूठा साबित कर चुका था। इस करिश्मे के बाद डेविड फ्रिथ भी भारतीय टीम सदमे में आ गए और उन्होंने विजडन बुक का वो पृष्ठ फाड़ा, जिसमें उन्होंने टीम इंडिया को नौसिखिया बताया था, और उसे दांतों से चबाने लगे। 


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विश्वकप के कुछ खास पल

मैदान में ही बन गया नियम
पहले विश्वकप के फाइनल में इंग्लैंड के ओपनर बल्लेबाज रॉय फ्रेडरिक्स ने डेनिस लिली के बाउंसर पर छक्का मारा। लेकिन वे अपने आप को नहीं संभाल सकें और विकेट के ऊपर गिर गए। इस घटना के बाद मैदानी अंपायरों के बीच असमंजस की स्थिति थी कि फ्रेडरिक्स को आउट करार दिया जाए या नहीं । ऐसे में मैच आधे घंटे के लिए रोक दिया गया। बाद में फ्रेडरिक्स को हिट विकेट आउट करार दिया गया। बताया जाता है कि दर्शक दीर्घा में मौजूद आईसीसी के अधिकारियों सहित अंपायरों ने बैठक के बाद यह फैसला लिया।  यह पहला मौका था जब मैदान में ही क्रिकेट का कोई नियम बनाया गया और फ्रेडरिक्स वनडे इतिहास में हिट विकेट आउट होने वाले पहले खिलाड़ी बन गए।   


विश्वकप : कुछ रोचक तथ्य
- 1975 : में क्रिकेट विश्वकप की शुरुआत हुई थी। इसमें आठ टीमों के बीच में कुल 15 मैच हुए थे।
- 1979 ः विश्वकप में भारत को एक जीत भी नसीब नहीं हुई
- 1983 ः फाइनल में कपिल देव ने इंडीज के विवि रिचडर्स का ऐतिहासिक कैच लिया।  ‌ 
- 1987 : विश्वकप में ओवरों की संख्या 60 से घटाकर 50 कर दी गई थी। 
-  1992 : विश्वकप में खिलाड़ियों के कपड़ों को उनके नाम सहित रंगीन किया गया।
- 1992 : विश्वकप में फील्डिंग के नियमों में बदलाव किए गए। इसमें पहले 15 ओवर तक केवल 2 खिलाड़ियों को 30 गज  के बाहर रहने की अनुमति दी गई। 
- 1992 : विश्वकप में बॉल का रंग लाल से बदलकर सफेद कर दिया गया था।
-  1996 : विश्वकप में श्रीलंका ने क्रिकेट में पहले 15 ओवरों में रनों की गति बढ़ाने की शुरुआत की। जिसका क्रिकेट के 20-20 प्रारूप में अनुसरण किया गया। 
- 1996 : विश्वकप के एक मैच में केन्या ने वेस्टइंडीज को हरा दिया था। यह जीत क्रिकेट जगत को चौंकाने वाली थी क्योंकि केन्या टीम की इसके पहले कोई पहचान नही थी यहां तक की ब्रायन लारा के विश्वकप शुरू होने के पहले केन्या के एक क्रिकेटर को ऑटोग्राफ  देने से तक को मना कर दिया था।
-  2003 : विश्वकप में शोएब अख्तर ने पहली बार क्रिकेट इतिहास की सर्वाधिक गति से गेंद फेंकी थी।
- 2007 :  हर्शल गिब्स अकेले ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होनें एक दिवसीय मैच में एक ओवर में 6 छक्के लगाए हैं। 2007 के विश्वकप में उन्होंने यह कीर्तिमान हॉलैंड के विरुद्ध बनाया था।
- 2011 : विश्वकप भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश के अलावा पाकिस्तान में भी होना था लेकिन 2009 में श्रीलंका की टीम पर हुए आतंकी हमले के कारण आईसीसी ने पाकिस्तान से मेजबानी छीन ली।

अरविंद तुम तो ऐसे ना थे...


एक नई राजनीतिक संस्कृति के निर्माण का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी, जिसकी ओर परंपरागत राजनीतिक दलों से निराश लोग बड़ी उम्मीदों के साथ देख रहे थे, में चल रहा विवाद निराश करने वाला है। पहले योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण पर कार्रवाई और अब मयंक गांधी के ब्लॉग के जरिए आप पर हमले से स्पष्ट है कि विवाद के केंद्र में केजरीवाल ही हैं। अभी यह मान लेना कि विवाद खत्म हो गया है, नासमझी होगी। इस विवाद ने ‘आप’ के बीच की वैचारिक दरार को खुलकर सामने ला दिया है। साथ ही कहीं न कहीं इस तथ्य को भी स्थापित किया है कि पार्टी के भीतर के झगड़ों को भीतर ही निपटाने की सलाहियत अभी शीर्ष नेतृत्व के पास नहीं है।  आप से उम्मीद की जा रही थी कि वह करिश्माई और वर्चस्वशाली नेताओं पर आधारित पार्टी होने के बजाय अंदरूनी लोकतंत्र के आधार पर चलने वाली एक आधुनिक पार्टी के रूप में उभरेगी, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि वह भी दूसरी पार्टियों की ही तरह अंतर्कलह व वर्चस्व की राजनीति से ग्रस्त है। अरविंद ने जनता से जुड़ने की तो अद्भुत क्षमता का प्रदर्शन किया है, लेकिन अपनी ही पार्टी के लोगों को जोड़कर रखने की क्षमता वे कभी नहीं दिखा सके।
 वे अपने अहंकार से ऊपर उठ पाने में नाकाम रहे। इससे किसी को इंकार नहीं होना चाहिए कि आज के केजरीवाल पहले वाले विनम्र, साहसी, आदर्शवादी केजरीवाल से बहुत भिन्न् हैं, जो कि सार्वजनिक जीवन में निजी निष्ठा की रक्षा के लिए ऊंचे और रसूखदार लोगों से भिड़ जाने में भी संकोच नहीं करते थे। लेकिन अब वे अपने आदर्शों से समझौता करने को तैयार हैं। उन्होंने दूसरी पार्टी से आए लोगों का भी अपनी पार्टी में स्वागत किया है और अनुचित स्रोतों से प्राप्त होने वाले धन की भी चिंता नहीं की है। प्रशांत भूषण को इसी से आपत्ति है। उनकी आपत्ति जायज भी है।  एक तथ्य यह भी है कि मामला बहुत बढ़ जाने के बाद 'आप" के संयोजक पद से इस्तीफे की पेशकश और पार्टी की बैठक में शामिल नहीं होने के केजरीवाल के निर्णय से हालात और खराब हुए हैं। केजरीवाल से इससे अधिक जिम्मेदाराना व्यवहार की उम्मीद की जाती है।  केजरीवाल को इस अवसर पर यादव और भूषण पर अपने विश्वस्तों से हमला करवाने के बजाय खुद उनके साथ बैठकर उनसे बात करनी चाहिए थी और उनके दृष्टिकोण का सम्मान करना चाहिए था। ऐसा नहीं हो सकता कि एक तरफ तो आप लोकतांत्रिक समावेश की बात करें और दूसरी तरफ पार्टी में केवल अपने मन की चलाते रहें।  अगर 'आप" को अपने द्वारा जगाई गई उम्मीदों पर खरा उतरना है तो उसे सबसे पहले तो नेताओं की एक दूसरी सशक्त पंक्ति तैयार करनी होगी। उसे अपने शीर्ष नेता का कार्यकाल निर्धारित करना होगा और एक व्यक्ति-एक पद के सिद्धांत पर सख्ती से अमल करना होगा। अब भी देर नहीं हुई है। केजरीवाल को चाहिए कि वे अपने अहंकार को ताक पर रखते हुए अपने साथियों की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाएं। 

Sunday, 1 March 2015

उपेक्षा के आगोश में नेशनल गेम्स


  • पिछले दिनों केरल में आयोजित हुए राष्ट्रीय खेलों में तमाम रिकॉर्ड टूटे और बने। कई सितारों ने फलक पर जगह बनाई और तमाम खिलाड़ियों की चमक फीकी रही। खेल का रोमांच चरम पर रहा, खिलाड़ियों ने जीतोड़ प्रदर्शन कर पदक जुटाए। लेकिन, कमी थी तो महज उनको सराहने वाले दर्शकों की। वह न टीवी चैनलों की फटाफट खबरों का हिस्सा बने और न ही अखबारी सुर्खियां। जहां रणजी और आईपीएल क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ी भी भगवान जैसा दर्जा पा जाते हैं, वहां भविष्य के ओलंपिक सितारों ने गुमनामी में ही पदक जीते और हार गए। यही है हमारा खेलों के प्रति रवैया! यहां क्रिकेट तो धर्म है और अन्य खेलों की चर्चा धर्म विरुद्ध! यह राष्ट्रीय खेलों की त्रासदी है कि उन्हें न तो मीडिया में कोई जगह मिल रही है और न ही दर्शक उन्हें देखने पहुंच रहे हैं। सच तो यह है कि इन खेलों की चर्चा तभी होती है, जब यहां से निकले किसी खिलाड़ी को ट्रेन से धक्का दे दिया जाता है या फिर वह आर्थिक तंगी की वजह से आत्महत्या करने को मजबूर होता है। यहां यह बताना जरूरी है कि राष्ट्रीय खेलों के आयोजन के पीछे मकसद था कि गली- मुहल्ले से निकले खिलाड़ियों के लिए एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया जाए जिसके जरिए वह एशियन गेम्स- कामनवेल्थ और ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों में जाकर भारत का नाम रोशन कर सकें।
  •  लेकिन अफसोस, यह टूर्नामेंट आज खुद अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। इस स्थिति के कई कारण हैं। दरअसल, हर स्तर पर इन खेलों का गला घोंटा जा रहा है। आयोजन में राजनीतिक हस्तक्षेप, घोटालेबाजी और यहीं से निकले बड़े खिलाड़ियों की उपेक्षा इनमें प्रमुख हैं। बहरहाल, केरल में आयोजित हुए 35वें राष्ट्रीय खेलों में भी पिछले संस्करणों जैसी हीं समस्याएं सामने आईं। शीर्ष खिलाड़ियों ने अलग अलग कारणों से नाम वापस ले लिए, स्टेडियम पूरी तरह तैयार नहीं थे, सचिन तेंदुलकर की मौजूदगी के बावजूद उद्घाटन समारोह फीका रहा और सबसे ऊपर आयोजकों पर बुनियादी ढांचे के विकास में भ्रष्टाचार के आरोप लगे।  बावजूद इसके खिलाड़ियों ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन जारी रखा। लगातार तीसरे साल सेना खेल नियंत्रण बोर्ड (एसएससीबी) पदक तालिका में पहले स्थान पर रहा। हालांकि मेजबान केरल ने कुल 162 पदकों के साथ सबसे ज्यादा पदक जीते और प्रतियोगिता में अपना अब तक का सबसे शानदार प्रदर्शन किया। खेल के पहले कुछ दिन तैराकों का दबदबा रहा जिन्होंने तरणताल में कई पुराने रिकार्ड डूबो दिए तो कुश्ती में हरियाणा ने अपना दबदबा कायम रखते हुए 18 स्वर्ण जीते।  वहीं जीतू राय और विजय कुमार के शानदार प्रदर्शन के सहारे एसएससीबी ने शूटिंग के 26 में से कुल 15 स्वर्ण पदक अपने नाम किए। अगर नए चेहरों की बात करें तो तैराकी प्रतिस्पर्धाओं में सबसे बड़े स्टार स्थानीय तैराक सजन प्रकाश रहे जिन्होंने छह स्वर्ण पदक जीते। शानदार प्रदर्शन की वजह से प्रकाश को अपने राज्य में ‘गोल्डन शार्क’ का नाम मिला। लेकिन इस शार्क को भविष्य में क्या इनाम और पहचान मिलेगा यह भी उसके प्रतिभा पर निर्भर करेगा। वहीं एशियाई खेलों के कांस्य पदक विजेता मध्य प्रदेश के संदीप सेजवाल और एसएससीबी के मधु पीएस ने चार-चार स्वर्ण पदक जीते। महिला वर्ग में रिचा मिश्रा और 15 साल की माना पटेल ने क्रमश: चार और तीन स्वर्ण पदक अपने नाम किए। एशियाई खेलों की पदक विजेता टिंटू लुका (800 मीटर और 4 गुना 400 मीटर रिले) और ओपी जैशा (5,000 मीटर एवं 10,000 मीटर) ने केरल के शानदार प्रदर्शन का नेतृत्व किया। लिंग परीक्षण में असफल रहने के बाद लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध के खिलाफ  कानूनी लड़ाई लड़ रहीं ओडिशा की दूती चंद मीट रिकार्ड बनाकर 100 मीटर में चैंपियन बनीं। अपने खिलाड़ियों को राज्य सरकारों ने कमोबेश सराहा होगा लेकिन केंद्र में इसकी चर्चा भी नहीं हुई।  बावजूद इसके खिलाड़ियों ने अपने प्रदर्शन के जरिए शीर्ष पर बैठे क्रिकेट के दीवानों को बताया है कि प्रतिभा, सुविधा और चर्चा की मोहताज नहीं है।