Wednesday, 26 February 2014

आंचलिक साहित्य के सिरमौर थे फणीश्वर नाथ 'रेणु' - दीपक कुमार


  
       यह जरूरी नहीं कि कोई साहित्यकार जिस मिट्टी से जुड़ा है वह अपनी रचनाओं में भी उस मिट्टी की खुशबू को समाहित कर दे, यह भी जरूरी नहीं कि वह साहित्यकार अपनी रचनाओं में ग्रामीण परिवेश को इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत करे कि पढ़ने वाला प्रत्येक पाठक खुद को उसी कल्पना लोक में महसूस करे। फिर भी इस लोक पर ऐसे भी साहित्यकार पैदा हुए हैं, जिन्होंने पाठकों का दिल अपनी रचनाओं के जीवंतता से जीता है, इनमें से एक हैं, फणीश्वर नाथ 'रेणु' । आंचलिक उपन्यासकार के तौर पर विख्यात हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार फणीश्वर नाथ 'रेणु' की रचनाओं में गहरी लयबद्धता है और इसमें प्रकृति की आवाज समाहित है। रेणु का 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना नामक गांव में जन्म हुआ था। रेणु के पिता कांग्रेसी थे, रेणु का बचपन आज़ादी की लड़ाई को देखते समझते बीता । स्वाधीनता संघर्ष की चेतना रेणु में उनके पारिवारिक वातावरण से आयी थी। रेणु भी बचपन और किशोरावस्था में ही देश की आज़ादी की लड़ाई से जुड़ गए थे। 1930-31 ई. में जब रेणु 'अररिया हाईस्कूल' के चौथे दर्जे में पढ़ते थे तभी महात्मा गाँधी की गिरफ्तारी के बाद अररिया में हड़ताल हुई, स्कूल के सारे छात्र भी हड़ताल पर रहे । रेणु ने अपने स्कूल के असिस्टेंट हेडमास्टर को स्कूल में जाने से रोका । रेणु को इसकी सज़ा मिली लेकिन इसके साथ ही वे इलाके के बहादुर सुराजी के रूप में प्रसिद्ध हो गए ।
लेकिन रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत की । उस समय उनकी कुछ अपरिपक्व कहानियाँ प्रकाशित भी हुई थीं, लेकिन 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तार होने के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने 'बटबाबा' नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी । 'बटबाबा' 'साप्ताहिक विश्वमित्र' के 27 अगस्त 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। रेणु की दूसरी कहानी 'पहलवान की ढोलक' 11 दिसम्बर 1944 को 'साप्ताहिक विश्वमित्र' में छ्पी। 1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी 'भित्तिचित्र की मयूरी' लिखी। उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है । 'रेणु' को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको उनकी कहानियों से भी मिली। 'ठुमरी', 'अगिनखोर', 'आदिम रात्रि की महक', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'अच्छे आदमी', 'सम्पूर्ण कहानियां', आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं। लेकिन प्रमुख रूप से रेणु जी एक आंचलिक उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध हुए।

अगर फणीश्वर नाथ रेणु को आंचलिक उपन्यासकार के तौर पर रेखांकित किया जाता है तो सिर्फ इसमें ही उनका व्यक्तित्व नहीं समाता । उनके लेखन में मानवीय रसप्रियता झलकती है जिसमें ग्राम्य भोलापन है । उनके लेखन से झलकता है कि वह सुधार के पक्षधर थे लेकिन इसके लिए वह नारे नहीं लगाते सिर्फ गांव के लोगों के मीठे झूठों को पकड़ते हैं।
एक बार बीबीसी के एक पत्रकार ने फणीश्वर नाथ 'रेणु'से पूछा कि आखिर आप अपनी रचनाओं में इतनी जीवंतता कैसे लाते हैं। तब उन्होंने अपने मनमोहक मुस्कान से जवाब दिया था,‘‘अपनी कहानियों में मैं अपने आप को ही ढूढ़ता फिरता हूँ। अपने को अर्थात आदमी को!। दरअसल, अपनी रचनाओं में उन्होंने बिहार के छोटे भूखंड़ की हथेली पर समूचे उतरी भारत के किसान की नियति-रेखा को उजागर किया । रेणु जी की रचनाओं की सबसे खास बात थी कि वह कविता की तरह लयात्मक होते थे, जिसमें देहाती माटी की महक समाहित है। वह आम जनों की भाषा में लिखने वाले साहित्यकार थे । रेणु जी की रचनाओं में महिलाएं बहुत ताकतवर होती थी। उनकी रचनाओं में जितना सीधा-सपाट पुरूष होता है स्त्री वैसी नहीं होती। वह छली होती है, वह बहुत सी तिकड़म को जानती है । रेणु ने अपनी कहानियों, उपन्यासों में ऐसे पात्रों को गढ़ा जिनमें एक दुर्दम्य जिजीविषा देखने को मिलती है, जो गरीबी, अभाव, भूखमरी, प्राकृतिक आपदाओं से जुझते हुए मरते भी है पर हार नहीं मानते। रेणु उपर से जितना सरल थे अंदर से उतने ही जटिल भी। रेणु की कहानियां नादों और स्वरों के माध्यम से नीरस भावभूमि में भी संगीत से झंकृत होती लगती है। रेणु अपनी कथा रचनाओं में एक साधारण मनुष्य, जो पार्टी, धर्म, झंड़ा रहित हो, की तलाश करते नजर आते है । उनका जीवन और समाज के प्रति उनका सरोकार प्रेमचंद की तरह ही है। इस दृष्टिकोण से रेणु प्रेमचंद के संपूरक कथाकार है। इसी वजह से प्रेमचंद के बाद रेणु को ही एक बड़ा पाठक वर्ग मिला।
रेणु की कथा-रचनाएं आंचलिक और राष्ट्रीय कही जाती रही है । रेणु की पहली कहानी बट बाबा बरगद के प्राचीन पेड़ के इर्द-गिर्द घूमती है, यह पेड़ पूज्य है गांववालों के लिए । एक पात्र निरधन साहू जो खूद कालाजार बीमारी से कंकाल हो गया है और उसे जानलेवा खांसी भी है जब सूनता है कि ‘‘बड़का बाबा सूख गइले का ? और गांव वाले जब उसे बताते है कि हां पेड़ सूख गया है तो निरधन साहू कहता है - अब ना बचब हो राम ! रेणु बताते है कि हिमालय और भारतवर्ष का जो संबंध है वही संबंध उस बरगद के पेड़ और गांव का था । सैकड़ों वर्षों से गांव की पहरेदारी करते हुए, यही है बटबाबा, पर यह क्या हुआ कि पूरे गांव को अपने स्नेह से लगातार सींचने वाला बट बृक्ष अचानक क्यों सूख गया?बहुत ही मार्मिक ढ़ंग से रेणु एक जीवंत चित्र गढ़ते है ।
रेणु का एक और कहानी पहलवान का ढोलक में पहलवान मर जाता है पर चित नहीं होता है अर्थात पराजित नहीं होता है, द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यानी आजादी के पहले लिखी गयी इन कहानियों में रेणु अपनी तीक्ष्ण नजरों से विश्वयुद्ध के काल का भयावह चित्र बनाने में सफल हुए है। इसी काल में बंगाल में पडे भीषण दुर्भिक्ष ने संपूर्ण भारत को हिला कर रख दिया था, यह भीषण दुर्भिक्ष इतिहास में दर्ज है परंतु रेणु जैसे साहित्यकार द्वारा गढ़ी गयी कहानी कलाकारका पात्र शरदेन्दु बनर्जी, जो एक चित्रकार था। जिसके पूरे परिवार को दुर्भिक्ष ने मार डाला। यही कलाकार दुर्भिक्ष पीडितों के सहायता के लिए पोस्टर बना कर जिंदा रहा, धन-दौलत की लालच से दूर यह कलाकार सौ प्रतिशत आदमी था। रेणु ने इस सौ फिसदी आदमी का चित्रण बहुत ही तन्मयता से किया है। रेणु की एक अन्य कहानी प्राणों में घुले हुए रंग बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योकि इस कहानी का मुख्य पात्र एक चिकित्सक है जिसे रेणु के कालजयी उपन्यास ‘‘मैला आंचल’’ में डाक्टर प्रशांत के रूप में देखा जा सकता हैन मिटने वाली भूख रेणु की मनोवैज्ञानिक कहानी है जिसकी मुख्य पात्र उषा देवी उपाध्याय उर्फ दीदी जी एक विधवा है जिसका संयम अंत में टूट जाता है। इस कहानी में बंगाल के अकाल की शिकार एक पागल भिखरिन मृणाल नामक पात्र है जिसका शहर के काम-पिपासुओं द्वारा बलात्कार किया जाता है जिसके फलस्वरूप वो गर्भवति हो जाती है और उसकी गोद में एक बच्चा आ जाता है । रेणु ने इस कहानी के माध्यम से काम-पिपासा को न मिटने वाली भूख कहा है और मनुष्य इतना अमानवीय और राक्षसी प्रवृति का हो सकता है, इसकी ओर भी बहुत ही सटीक ढ़ंग से संकेत किया है । रेणु की एक कहानी अगिनखोरएक साहित्यकार के कुकृत्य को इस अंदाज में लिखा है कि पढ़ते बनता है. कहानी की एक पात्र आभा का सूर्यनाथ द्वारा गर्भवति करना और फिर बाद में आभा का पुत्र एक ऐसा पात्र है जो अपने नाजायज होने का बदला साहित्यिक ढ़ंग से अपने पिता की हंसी उड़ाते हुए लेता है। वह पात्र अपना कवि नाम आइक्-स्ला्-शिवलिंगाबताता है और आइक्-स्लाको तकियाकलाम की तरह पूरी कहानी में इस्तेमाल करता है, पूछे जाने पर कि आइक्-स्ला शब्द का क्या अर्थ है बड़े ही निराले अंदाज में कहता है ‘‘ यह मेरे व्यक्तिगत शब्द-भंडार का शब्द है, जिसका अर्थ कुछ भी हो सकता है.’’ साहित्यकारों की कथनी और करनी में अंतर का सटीक नमूना रेणु के कहानी अगिनखोरमें देख जा सकता है जब इस कहानी का पात्र कहता है ‘‘मैंने कवि कर्म छोड़कर फिलहाल, अपनी रोटी के लिए कामेडियन का काम शुरू किया है.’’यह दिलचस्प बात है कि बॉलीवुड के मशहुर गीतकार शैलेंद्र को फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफाम' इतनी अच्छी लगी की उन्होंने  इस पर राजकपूर और वहीदा रहमान को लेकर फिल्म 'तीसरी कसम' बना डाली।
रेणु ने अपनी कहानी रखवालामें तो एक नेपाली गांव की ऐसी कहानी लिखी है कि इस कहानी में बहुत सारे संवाद नेपाली भाषा में है। रेणु ने एक अन्य कहानी नेपाल के पृष्ठभूमि में नेपाली क्रांतिकथाके नाम से लिखा, जो रेणु को हिन्दी का एकमात्र नेपाल प्रमी कहानीकार के रूप मे प्रतिष्ठित करता है। पार्टी का भूत नामक कहानी में रेणु अपनी अवस्था का बयान करते हुए कहते है कि उनको जो हुआ है वो तो रांची का टिकट कटाने वाला रोग है। वस्तुत पार्टी का भूत राजनीति पर लिखी गयी राजनीति विरोध की कहानी है। एक अन्य अत्यंत मानवीय कहानी 1946 ई. में रेणु ने रसूल मिस्त्री लिखी । इस कहानी का मुख्य पात्र एक ऐसा व्यक्ति है जो दूसरे के लिए जीता है। इस कहानी में प्रसिद्ध रोमन कथाकार दांते की डिवाइन कामेडी की याद आती है जब रसूल मिस्त्री कहता है कि दोजख-बहिश्त, स्वर्ग-नरक सब यहीं है। अच्छे और बुरे का नतीजा तो यहीं मिल जाता है। रसूल मिस्त्री के दूकान के साइनबोर्ड पर किसी ने लिख दिया है, ‘यहां आदमी की भी मरम्मत होती है.जब सन् 1946 ई. में रेणु बीमार पड़े तो उन्होंने बीमारों की दुनिया मेंनाम से एक कहानी लिखी। रेणु की कहानी आज भी उतनी ही प्रसांगिक है जितनी जब लिखी गयी थी तब थी। बीमार की दुनिया में का एक पात्र है वीरेन जो और कोई नहीं खूद रेणु है और वीरेन अपने मित्र अजीत से जो कहता है वो आज के भारत की कहानी लगती है। वीरेन कहता है कि ‘‘ मैंने जिंदगी को आपके जेम्स जॉयस से अधिक पहचाना है। हमारी जिंदगी हिन्दुस्तान की जिंदगी है। हिन्दुस्तान से मेरा मतलब है असंख्य गरीब मजदूर, किसानों के हिन्दुस्तान से। हम अपनी मिट्टी को पहचानते है, हम अपने लोगों को जानते है। हमने तिल-तिल जलाकर जीवन को, जीवन की समस्याओं को सुलझाने की चेष्टा की है। ’’ 1947 ई. में रेणु ने इतिहास, मजहब और आदमीनामक कहानी लिखी जिसमें देश का विभाजन, साम्प्रदायिक दंगे, भूखा और बीमार देश की गहरी पीड़ा है। जनवरी 1948 ई. में प्रकाशित रेखाएं-वृतचक्रनामक कहानी में स्वतंत्रता, बंटवारा तथा अन्य राजनीतिक घटनाओं का सूक्ष्म वर्णन है परंतु इस कहानी में एक घायल सैनिक के माध्यम से रेणु ने एक फैंटेसी के शिल्प का भी प्रयोग किया है। इसी वर्ष एक अन्य कहानी खंडहरआयी जिसमें रेणु लिखते है कि चारों ओर शांति है, स्वराज मिल गया फिर भी एक तनाव है।  इस कहानी में रेणु आधुनिक समाज की विशृंखलता की पड़ताल करते हुए भी आशावान दिखते है. इस कहानी में रेणु अपने समकालीन गजानन माधव मुक्तिबोध की तरह मन से लहूलूहान है।
स्वतंत्रता के बाद रेणु पूर्णिया से नई दिशानामक एक सप्ताहिक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन करते थे। सन् 1949 ई. में नई दिशाका शहीद विशेषांकनिकाला जिसमें उनकी धर्मक्षेत्रे-कुरूक्षेत्रेनामक कहानी प्रकाशित हुयी थी जो कथा और शिल्प में उनकी अन्य कहानियों से भिन्न थी। लतिका राय चौधरी से विवाह उपरांत 1952 ई. में रेणु ने अपनी कालजयी रचना ‘‘मैला आंचल’’ लिखी। 1953 ई. में उनकी दो कहानियां बंडरफूल स्टुडियोऔर टोन्टी नैनप्रकाशित हुयी थी।
मैला आंचल के प्रकाशन से पहले रेणु की कहानियों के फेहरिस्त का अंतिम कहानी दिल बहादुर दाज्युहै जो एक गोरखा नौजवान पर लिखी शब्द-चित्रात्मक कहानी है.रेणु की हर कहानी में नये शिल्प का प्रयोग इनकी विशेषता है। रेणु एक ढर्रे पर कहानी लिखना पंसद नही करते थे। रेणु के उपन्यासों यथा मैला आंचल, जुलूस, परती परिकथा, ऋणजाल-धनजाल, नेपाली क्रांतिकथा, पल्टूबाबू रोड अलग-अलग भाषा-शैली और शिल्प में गढ़ी गयी कृतियां है।
कथा-साहित्य के अतिरिक्त संस्मरण, रेखाचित्र, और रिपोर्ताज आदि विधाओं में लेखन के अलावा फणीश्वर नाथ रेणु का राजनीतिक आंदोलन से गहरा जुड़ाव रहा था। जीवन के संध्याकाल में वह जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में शामिल हुए, पुलिस दमन के शिकार हुए और जेल गये। 11 अप्रैल 1977 को फणीश्वर नाथ रेणु का देहावसान हो गया।

लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं।

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Saturday, 22 February 2014

मेरे देश की संसद मौन है! — दीपक कुमार

एक आदमी,रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है।
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं-
यह तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन है ।
धूमिल ने जब यह कविता लिखी होगी तब शायद उन्हें 15 वीं लोकसभा के अंतिम सत्र में एक सांसद द्वारा सदन में छिड़के गए पेपर स्प्रे का ना तो मतलब पता होगा और न ही इसके उपयोग का तरीका । क्योंकि उस दौर में न तो वैश्वीकरण का मायाजाल था और न ही आधुनिकता की परिकाष्टा थी। दरअसल, वह दौर समाजवादी सोच का भारत था, जहां रह रहकर अत्यंत आध्यात्मिक तौर पर समझाया जाता था कि प्रजा ही राजा है, वही असली मालिक है और संसद में बैठे नुमांइदे उनके नौकर हैं । जनता जैसे आदेश देगी वैसा ही होगा और उस दौर में नेताओं ने भी इस सच को स्वीकारा था। तभी तो एक बार जनरल डिब्बे में यात्रा कर रहे देश के सम्मानित व्यक्ति और समाजवादी सोच के संसद सदस्य डा. राममनोहर लोहिया ने रतलाम स्टेशन पर पीने वाले पानी के लिए ट्रेन की चैनपुलिंग कर दी थी। तब भी कार्यकर्ता थें, लेकिन आज की तरह नहीं । लोहिया ने उन कार्यकर्ताओं से कहा कि नेहरू को फोन लगाया जाए,उनसे यह कहा जाए कि जनरल बोगी में सफर करने वाले एक आम आदमी को अपने दिए हुए टैक्स के पैसे से पानी पीना है । तब तत्कालिन प्रधानमंत्री नेहरू ने बाकायदा माफी भी मांगी थी और तब के रेलमंत्री जॉन मथाई को देश के तमाम ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर पानी की पर्याप्त व्यवस्था करने का तुरंत आदेश दिया था।
उस दौर में चुनावी प्रक्रिया के अर्थ भी अलग होते थे। उस दौर में भी विपक्ष होता था लेकिन आज की तरह नहीं । उस दौर का विपक्ष उंगलियों पर गिन लिया जाता था, बावजूद इसके सत्ता पक्ष का सम्मानित होता था। इतना ही नहीं वह संक्षिप्त विपक्ष समय समय पर सत्ता के जनविरोधी कदमों का विरोध भी करता था, लेकिन आज की तरह नहीं । तभी तो नेहरू ने जब विपक्ष में बैठे उस दौर के कांग्रेसी नेता राममनोहर लोहिया से अनुरोध किया कि आप भी सत्ता पक्ष के साथ आ जाईए, तब लोहिया ने कहा कि हम जब आपके साथ आ जाएंगे तब इस देश का भला कौन करेगा । मतलब यह कि सिर्फ सत्ता पक्ष ही रहेगा तब वह तानाशाह बन जाएगा। चलिए हम आपके उंट होंगे और आप हमारे हाथी। उस वक्त बात को नेहरू जी ने मजाकिया अंदाज में जरूर लिया लेकिन बाद में उन्ही ने लोहिया के इस कदम को एतिहासिक बताया था। यानि की सत्ता और विपक्ष में एक बेहद सहयोग से भरा माहौल होता था। बावजूद इसके धूमिल ने अपनी कविता में लोकतंत्र की जो रेखाचित्र खींच डाली उसमें सत्ता और जनता के बीच साफ तौर पर एक दूरी दिखाई दे रही थी। यह धूमिल की खासियत ही थी जो उन्हें लोकतंत्र के उस शुरुआती दौर में भी रोटी बनाने और उससे खेलने वाले में जमीन आसमान का अंतर दिखाई देता था, यह उनकी दृष्टि थी, जो छल को परत दर परत देख पाती थी।

लेकिन ऐसा नहीं है कि संसदीय मर्यादाओं और सहयोग की भावनाएं उसी दौर में होती थी। कभीकभी लगता है कि वह दौर आज भी जिंदा है, तभी तो 15 वीं लोकसभा का अंत जिस भावनाओं और प्यार के साथ हुआ उसने पिछले लोकसभा के सारे गिलेशिकवे को एक ही झटके में खत्म कर दिया । संसद में मौजूद लगभग हर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि ने एक दूसरे को जिस अंदाज में अगले लोकसभा सत्र में मौजूद रहने की शुभकामनाएं दी उससे एक समय के लिए लगा की जी नहीं.. अभी संसद जिंदा है, यहां मौजूद जनप्रतिनिधि के दिल में प्यार जज्बात जैसे शब्द जिंदा हैं । सबने किसी न किसी रूप में अपनी भावनाएं जाहिर की लेकिन इन सब के केंद्र में संसद के बुजूर्ग सदस्य लालकृष्ण आडवानी रहें  तो बाद में आडवानी ने भी अपनी आसुंओं और शुक्रिया को संसद के पटल पर रख दिया । एक बार के लिए ऐसा लगा की हमारे संसद सदस्यों में कमाल की भावनाएं हैं। कोई चुटकी भी लेता है तो उसमें भी उसकी संवेदनाएं झलकती हैं और झलके भी क्यों न? क्योंकि 15 वीं लोकसभा का आखिरी सत्र जो था, या यूं कहें आखिरी दिन भी था। न जाने कौन आए 16 वीं लोकसभा में, इसलिए बहने दो आंसुओं को, कहने दो जमाने को..सहने दो सितम को.. जैसे जुमले याद आने लगें।
अब अगर बात की जाए अतीत यानि 15 वीं लोकसभा की, तो 15 वीं लोकसभा का आख़िरी सत्र बेहद हंगामेदार साबित हुआ। इस लोकसभा के आख़िरी सत्र में मिर्च के स्प्रे, सदस्यों के निलंबन और लगातार शोर-गुल ने संसदीय कर्म में गिरावट का जो परिचय दिया, उसे देर तक याद रखा जाएगा। वहीं अंतरिम रेल बजट पेश करते वक्त रेल मंत्री का भाषण सदन के पटल पर रखकर काम चलाया गया। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, जब केंद्रीय मंत्री अपनी सरकार का विरोध व्यक्त करते हुए 'वेल' में उतरे हों। आम बजट और रेल बजट बगैर चर्चा के पास हो गए। इस सत्र में लोकसभा के सीधे प्रसारण को रोककर तेलंगाना विधेयक को पारित किए जाने को आपातकाल से जोड़कर देखा गया । इस फ़ैसले को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपने विदाई भाषण में काफी मुश्किल भरा बताया। बतौर प्रधानमंत्री वे सदन में आख़िरी बार नज़र आए थे, इसलिए उन्होंने संसद के सभी सदस्यों का शुक्रिया भी अदा किया।
लेकिन अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के शासनकाल में आर्थिक उदारीकरण से जुड़े अनेक विधेयकों को पास नहीं किया जा सका। जीएसटी और डायरेक्ट कोड जैसे काम अधूरे रह गए । बांग्लादेश के साथ सीमा को लेकर समझौता नहीं हो पाया। लोकसभा में पड़े सत्तर के आसपास बिल लैप्स हो गए । इतनी बड़ी संख्या में बिल पहले कभी लैप्स नहीं हुए । सन 2010 के लोकसभा का छठा सत्र लगभग पूरी तरह 2जी 'घोटाले' को लेकर संयुक्त संसदीय समिति बनाने की माँग के कारण ठप रहा । हद तो तब हुई जब फरवरी 2012 में तत्कालीन रेल मंत्री व तृणमूल कांग्रेस के सांसद दिनेश त्रिवेदी ने रेल बजट पेश किया, जिसमें किराया-भाड़ा बढ़ाने का प्रस्ताव था। तृणमूल कांग्रेस की प्रधान ममता बनर्जी ने न सिर्फ उस घोषणा की निंदा की, बल्कि रेल मंत्री को पद से हटाने का फैसला भी सुना दिया। ऐसा पहली बार हुआ जब रेल बजट एक मंत्री ने पेश किया और उसे पास करते वक्त दूसरे मंत्री थे। संसदीय राजनीति के लिए ऐसी घटनाएं अटपटी थीं ।
हालांकि दूसरी ओर इस लोकसभा के कार्यकाल के दौरान सरकार ने कई अहम विधेयकों को पारित भी किया। जिसमें 'लोकपाल बिल' का जिक्र होना जरूरी है। अगर थोड़ा पिछे चले जाएं तो 2009 में जब 15वीं लोकसभा आई तो सरकार ने आते ही शिक्षा का अधिकार क़ानून पास करा दिया था। फिर महिलाओं के आरक्षण बिल को 2010 में राज्यसभा में पास करा लिया गया। लेकिन उसी दौरान 2 जी स्कैम,कॉमनवेल्थ गेम्स में हुई घोटालेबाजी ने 2010 के शीतकालीन सत्र से संसद के कामकाज में ठहराव लानी शुरू कर दिया। बावजूद इसके 2013 में खाद्य सुरक्षा विधेयक, भूमि अधिग्रहण बिल, और दिसंबर आते-आते लोकपाल विधेयक भी पास हो गया।
यह बात अलग है कि इन विधेयकों को पास कराने के दौरान उन पर कभी राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई । मसलन, जब महिला आरक्षण बिल पास हो रहा था तो समाजवादी पार्टी के 7-8 सांसदों को सस्पेंड करना पड़ा, तब जाकर बिल पास हो पाया था। उसी तरह तेलंगाना बिल पास कराने के लिए लोकसभा और राज्यसभा से सांसदों को सस्पेंड करना पड़ा। सदन में चर्चा कम और हंगामा ज़्यादा हुआ, कभी कोई दल संसद को वॉक आउट करता तो कभी कोई । यानि की संसद अब मौन नहीं था, और न ही मौन होना चाहता था, उसे तो बस अपनी जिद मनवानी थी।
लेकिन संसद की गरिमा को बचाने के लिए यह जरूरी है कि आपस में राजनीतिक समझ बनाई जाए। एक बात यह भी है कि संसद सदस्यों की गरिमा कम हुई है , इसके लिए संसद सदस्य ही जिम्मेवार हैं । अब लोगों के अंदर संसद के प्रति यह इमेज बन चुकी है कि यहां सिर्फ तू-तू, मैं-मैं ही होती है । उपराष्ट्रपति जी ने दुखी होकर एक सत्र में कहा भी था कि हम लोगों के बीच क्या इमेज दे रहे हैं। हालांकि कई लोग मानते हैं कि संसद के कार्यवाही को जब मीडिया ने फोकस करना शुरू किया तभी से हंगामें बढ़े हैं शायद यह भी कारण हो सकता है लेकिन एक सच यह भी है कि आज कोई सदस्य कोई विषय उठाना चाहते हैं और उन्हें मौका नहीं मिलता तो वे सदन की कार्यवाही में रूकावट डाल कर अपनी बात कहना चाहते हैं। दूसरी बात यह भी है कि राजनीतिक कारणों से सदन में रुकावट डालना स्क्रिप्टेड होने लगा है । यानि संसद में हंगामें तय हैं, तो मौन का कोई सवाल ही नहीं है, और जब हंगामें होंगे तो जनता से जुड़े सवालों का क्या होगा? यह भी सोच कर डरावना लगता है।
ऐसे में धूमिल की यह कविता कहीं न कहीं सार्थक भी है। क्योंकि इसी लोकसभा में भ्रष्टाचार के मुददे पर जिस तरीके से अन्नारामदेव के आंदोलन के जरिए जनता सड़क पर उतरी उससे देश के भविष्य और लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यानि जन का जो तंत्र है वह अब जन का नहीं रह गया है। ऐसे में यहां अब जनजनार्दन केवल रोटी बेलता है, खाते तो देश के हंगामेंदार संसद के जनप्रतिनिधि ही हैं। बहरहाल, लोकसभा के अगले सत्र में कुछ नए चेहरे भी होंगें और कुछ पूराने भी, सब्र कीजिए वो क्या करते हैं।
 लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं।
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Friday, 21 February 2014

जन्मदिवस विशेष सूर्यकांत त्रिपाठी निराला: कभी न होगा मेरा अंत — दीपक कुमार


21 फरवरी का दिन बहुत ही खास होता है। क्योंकि लगभग 118 साल पहले आज ही के दिन हिंदी साहित्य जगत के एक नए प्रयोगधर्मी सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म हुआ था। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, साहित्य की दुनिया का एक ऐसा नाम है जिसने अपने साहित्यिक रचनाओं से हिंदी जगत को या काव्य जगत को ही एक नया आयाम दिया । अक्सर उनका जन्मदिवस वसंत-पंचमी को मनाया जाता है, क्योंकि वसंत-पंचमी के दिन सरस्वती की पूजा होती है और निराला सरस्वती के वरद पुत्र थे, तो लोगों ने मान लिया है कि किसी और दिन उनका जन्म हो ही नहीं सकता था । उनका जन्म इसी दिन हो सकता है। इससे पवित्र दिन और कोई हो नहीं सकता है। शायद यही वजह है कि खड़ी-बोली हिंदी में सरस्वती पर जितनी कविताएँ निराला ने लिखी हैं अब तक किसी और कवि ने नहीं लिखी।  
निराला जी एक कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार थे। उन्होंने कई रेखाचित्र भी बनाये। उनका व्यक्तित्व अतिशय विद्रोही और क्रान्तिकारी तत्त्वों से निर्मित हुआ है। उसके कारण वे एक ओर जहाँ अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तनों के सृष्टा हुए, वहाँ दूसरी ओर परम्पराभ्यासी हिन्दी काव्य प्रेमियों द्वारा अरसे तक सबसे अधिक ग़लत भी समझे गये। उनके विविध प्रयोगों- छन्द, भाषा, शैली, भावसम्बन्धी नव्यतर दृष्टियों ने नवीन काव्य को दिशा देने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसलिए घिसी-पिटी परम्पराओं को छोड़कर नवीन शैली के विधायक कवि का पुरातनतापोषक पीढ़ी द्वारा स्वागत का न होना स्वाभाविक था। लेकिन प्रतिभा का प्रकाश उपेक्षा और अज्ञान के कुहासे से बहुत देर तक आच्छन्न नहीं रह सकता।
निराला: एक परिचय
'निराला' का जन्म महिषादल स्टेट मेदनीपुर (बंगाल) में था। इनका अपना घर उन्नाव ज़िले के गढ़ाकोला गाँव में है।'निराला' के पिता का नाम पं. रामसहाय था, जो बंगाल के महिषादल राज्य के मेदिनीपुर ज़िले में एक सरकारी नौकरी करते थे। निराला का बचपन बंगाल के इस क्षेत्र में बीता जिसका उनके मन पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है। तीन वर्ष की अवस्था में उनकी माँ की मृत्यु हो गयी और उनके पिता ने उनकी देखरेख का भार अपने ऊपर ले लिया। निराला की शिक्षा यहीं बंगाली माध्यम से शुरू हुई। हाईस्कूल पास करने के पश्चात उन्होंने घर पर ही संस्कृत और अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन किया। प्रारम्भ से ही रामचरितमानस उन्हें बहुत प्रिय था। वे हिन्दी, बंगला, अंग्रेज़ी और संस्कृत भाषा में निपुण थे, संगीत में उनकी विशेष रुचि थी। पन्द्रह वर्ष की अल्पायु में निराला का विवाह मनोहरा देवी से हो गया। रायबरेली ज़िले में डलमऊ के पं. रामदयाल की पुत्री मनोहरा देवी सुन्दर और शिक्षित थीं, उनको संगीत का अभ्यास भी था। पत्नी के ज़ोर देने पर ही उन्होंने हिन्दी सीखी। इसके बाद अतिशीघ्र ही उन्होंने हिन्दी में कविता लिखना शुरू कर दिया। बचपन के नैराश्य और एकाकी जीवन के पश्चात उन्होंने कुछ वर्ष अपनी पत्नी के साथ सुख से बिताये, किन्तु यह सुख ज़्यादा दिनों तक नहीं टिका और उनकी पत्नी की मृत्यु उनकी 20 वर्ष की अवस्था में ही हो गयी। बाद में उनकी पुत्री जो कि विधवा थी, की भी मृत्यु हो गयी। वे आर्थिक विषमताओं से भी घिरे रहे। ऐसे समय में उन्होंने विभिन्न प्रकाशकों के साथ प्रूफ रीडर के रूप मॆं काम किया, इन्होंने 1922 से 23 के दौरान कोलकाता से प्रकाशित 'समन्वय' का संपादन किया। 1923 के अगस्त से 'मतवाला' के संपादक मंडल में काम किय, इनके इसके बाद लखनऊ में गंगा पुस्तक माला कार्यालय और वहाँ से निकलने वाली मासिक पत्रिका 'सुधा' से 1935 के मध्य तक संबद्ध रहे। इन्होंने 1942 से मृत्यु पर्यन्त इलाहाबाद में रह कर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य भी किया। वे जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है।

लेकिन तमाम खुशियों, गमों के तुफान में भी उन्होंने मां सरस्वती के दामन को कभी नहीं छोड़ा और शायद मां सरस्वती ने भी इसी वजह से उनपर हमेशा कृपा बनाए रखी। निराला ने मां सरस्वती को अनेक अनुपम एवं अभूतपूर्व चित्रों में उकेरा है। उन्होंने सरस्वती के मुखमंडल को करुणा के आँसुओं से धुला कहा है । यह सरस्वती का नया रूप है। जिस तरह तुलसी ने अन्नपूर्णा को राजमहलों से निकालकर भूखे-कंगालों के बीच स्थापित किया उसी तरह निराला ने सरस्वती को मंदिरों, पूजा-पाठ के कर्मकांड से बाहर लाकर खेतों-खलिहानों में श्रमजीवी किसानों के सुख-दुख भरे जीवन क्षेत्र में स्थापित किया । निराला का कवि-जीवन प्रकट करता है कि सफलता और सार्थकता समानार्थक नहीं हैं । विषम-समाज में सफल व्यक्ति प्रायः सार्थक नहीं होते। सफलता निजी जीवन तक सीमित होती है। 
कवि सरस्वती की साधना करके शब्दों को अर्थ प्रदान करता है। उन्हें सार्थक बनाता है। वस्तुतः शब्द ही कवि की सबसे बड़ी संपत्ति हैं और उसी संपत्ति पर कवि को सबसे अधिक भरोसा होता है। तुलसी ने लिखा था -'कबिहिं अरथ आखर बल साँचा' कवि को अर्थ और अक्षर का ही सच्चा बल होता है। लेकिन शब्दार्थ पर यह विश्वास कवि को कदम-कदम पर जोखिम में डालता है। सफल साहित्यकार इस जोखिम में नहीं पड़ते। वे शब्दों की अर्थवत्ता का मूल्य नहीं चुकाते। सरस्वती के साधक पुत्र यह जोखिम उठाते हैं और शब्दों के अर्थ का मूल्य चुकाते हैं। और वही उनकी शब्द-साधना को मूल्यवान बनाता है। निराला का जीवन मानो इस परीक्षा की अनवरत यात्रा है। उसमें से अनेक से हिंदी समाज परिचित है और अनेक से अभी परिचित होना बाकी है। एक उदाहरण मार्मिक तो है ही, मनोरंजक भी है।
कहते हैं, एक वृद्धा ने घनघोर जाड़े के दिनों में निराला को बेटा कह दिया। वृद्धाएँ प्रायः युवकों को बेटा या बच्चा कहकर संबोधित करती हैं। वह वृद्धा तो निराला को बेटा कहकर चुप हो गई लेकिन कवि निराला के लिए बेटा एक अर्थवान शब्द था। वे इस संबोधन से बेचैन हो उठे। अगर वे इस बुढ़िया के बेटा हैं तो क्या उन्हें इस वृद्धा को अर्थात्‌ अपनी माँ को इस तरह सर्दी में ठिठुरते छोड़ देना चाहिए। संयोग से उन्हीं दिनों निराला ने अपने लिए एक अच्छी रजाई बनवाई थी। उन्होंने वह रजाई उस वृद्धा को दे दी। यह एक साधारण उदाहरण है कि शब्दों को महत्व देने वाला कवि शब्दार्थ की साधना जीवन में कैसे करता है।  
यह साधना केवल शब्द पर ही विश्वास नहीं पैदा करती है, वह आत्मविश्वास भी जगाती है। जिन दिनों निराला इलाहाबाद में थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के यशस्वी वाइस चांसलर अमरनाथ झा भी वहीं थे। शिक्षा, संस्कृति और प्रशासकीय सेवाओं के क्षेत्र में अमरनाथ झा का डंका बजता था। उनका दरबार संस्कृतिकर्मियों से भरा रहता था। अमरनाथ झा ने निराला को पत्र लिखकर अपने घर पर काव्य पाठ के लिए निमंत्रित किया। पत्र अंग्रेजी में था। निराला ने उस पत्र का उत्तर अपनी अंग्रेजी में देते हुए लिखा - आई एम रिच ऑफ माई पुअर इंग्लिश, आई वाज ऑनर्ड बाई योर इनविटेशन टू रिसाइट माई पोयम्स एट योर हाउस। हाउ एवर मोर आनर्ड आई विल फील इफ यू कम टू माई हाउस टू लिसिन टू माई पोयम्स।" (मैं गरीब अंग्रेजी का धनिक हूँ। आपने मुझे अपने घर आकर कविता सुनाने का निमंत्रण दिया मैं गौरवान्वित हुआ। लेकिन मैं और अधिक गौरव का अनुभव करूँगा यदि आप मेरे घर आकर मेरी कविता सुनें)।
निराला तो कहीं भी, किसी को भी कविता सुना सकते थे लेकिन वे वाइस चांसलर और अपने घर पर दरबार लगाने वाले साहित्य संरक्षक के यहाँ जाकर अपनी कविताएँ नहीं सुनाते थे। यह शब्दार्थ का सम्मान, सरस्वती की साधना का सच्चा रूप था।  
कहते हैं, एक बार ओरछा नरेश से अपना परिचय देते हुए निराला ने कहा,'हम वो हैं जिनके बाप-दादों की पालकी आपके बाप-दादा उठाते थे।' यह कवि की अपनी नहीं बल्कि कवियों की परंपरा की हेकड़ी थी और निराला उस पारंपरिक घटना स्मृति का संकेत कर रहे थे, जब सम्मानित करने के लिए छत्रसाल ने भूषण की पालकी स्वयं उठा ली थी।
लेकिन निराला की रचनाओं में अनेक प्रकार के भाव पाए जाते हैं। यद्यपि वे खड़ी बोली के कवि थे, पर ब्रजभाषा व अवधी भाषा में भी कविताएँ गढ़ लेते थे। उनकी रचनाओं में कहीं प्रेम की सघनता है, कहीं आध्यात्मिकता तो कहीं विपन्नों के प्रति सहानुभूति व सम्वेदना, कहीं देश-प्रेम का ज़ज़्बा तो कहीं सामाजिक रूढ़ियों का विरोध व कहीं प्रकृति के प्रति झलकता अनुराग। इलाहाबाद में पत्थर तोड़ती महिला पर लिखी उनकी कविता आज भी सामाजिक यथार्थ का एक आईना है। उनका ज़ोर वक्तव्य पर नहीं वरन चित्रण पर था, सड़क के किनारे पत्थर तोड़ती महिला का रेखाँकन उनकी काव्य चेतना की सर्वोच्चता को दर्शाता है।
निराला जैसे कवि के व्यक्तित्व को हम आज के परिदृश्य में कैसे देखें। पहली बात तो मन में यही आती है कि राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद कितनी तेजी से हम सांस्कृतिक दृष्टि से पराधीन हो गए हैं। यह ऐतिहासिक विडंबना अब अबूझ नहीं रह गई है। साफ दिखलाई पड़ रही है। एक ओर देश के प्रायः सभी सांस्कृतिक मंचों पर अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवादी अपसंस्कृति का कब्जा बढ़ता जा रहा है और उससे भी यातनाप्रद स्थिति यह है कि हम उससे उबरने का कोई उद्योग नहीं कर रहे हैं। बाहरी तौर पर देखने से स्थिति बड़ी चमत्कारी और सुखद लगती है।
सब मिलाकर 'निराला' भारतीय संस्कृति के द्रष्टा कवि हैं-वे गलित रुढ़ियों के विरोधी तथा संस्कृति के युगानुरूप पक्षों के उदघाटक और पोषक रहे हैं। पर काव्य तथा जीवन में निरन्तर रुढ़ियों का मूलोच्छेद करते हुए इन्हें अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ा। मध्यम श्रेणी में उत्पन्न होकर परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से मोर्चा लेता हुआ आदर्श के लिए सब कुछ उत्सर्ग करने वाला महापुरुष जिस मानसिक स्थिति को पहुँचा, उसे बहुत से लोग व्यक्तित्व की अपूर्णता कहते हैं। पर जहाँ व्यक्ति के आदर्शों और सामाजिक हीनताओं में निरन्तर संघर्ष हो, वहाँ व्यक्ति का ऐसी स्थिति में पड़ना स्वाभाविक ही है। हिन्दी की ओर से 'निराला' को यह बलि देनी पड़ी। जागृत और उन्नतिशील साहित्य में ही ऐसी बलियाँ सम्भव हुआ करती हैं-प्रतिगामी और उद्देश्यहीन साहित्य में नहीं।
लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं।


Wednesday, 19 February 2014

इस 'आप' को क्या नाम दूं... दीपक कुमार

14 फरवरी को जिस वक्त देश के युवा वैलेंटाइन डे मना रहे थे लगभग उसी दौरान दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे ने अचानक ही देश की राजनीति में एक नया ड्रामा खड़ा कर दिया। केजरीवाल की सरकार ने कुछ खास फैसले, कुछ विवाद, कुछ नाटक-नौटंकी के बाद इस्तीफा तो दे दिया है लेकिन इस फैसले के बाद कई अहम सवाल खड़े हो गएं, जिन सवालों का जवाब देश की जनता को देना और समझाना जरूरी है, जो शायद अरविंद केजरीवाल नहीं कर सकते हैं । क्योंकि अब वक्त आ गया है यह जानने का कि क्या वाकई अरविंद केजरीवाल आम आदमी के शुभचिंतक हैं? क्या अरविंद भ्रष्टाचार मिटाकर आम आदमी की तकलीफ दूर करने की नीयत से राजनीति में आए थे? और अगर वाकई केजरीवाल का मकसद आम आदमी की तकलीफों को दूर करना था तो फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी को जन लोकपाल बिल की आड़ में क्यों छोड़ दिया?
दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में सात सप्ताह (49 दिन) की सरकार के मुखिया अरविंद केजरीवाल का जो रूप देश के सामने आया है उससे तो अरविंद केजरीवाल का मतलब आम आदमी से धोखा ही साबित हुआ। जिस आम आदमी की सहूलियत के लिए आम आदमी का मसीहा बनकर केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुए थे, जनता को मुसीबत का लबादा ओढ़ाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी से अलग होने का फैसला कर लिया। अगर कुछ दिन पहले कि बात को ही याद करें तो केजरीवाल ने दिसंबर महीने में जनमत संग्रह से  दिल्ली की कमान संभाली थी, लेकिन यहीं से एक सवाल उठता है कि कुर्सी छोड़ने के लिए उन्होंने जनमत संग्रह क्यों नहीं किया? एक बात तो सच है कि अरविंद केजरीवाल के इस्तीफा देने के बाद कहीं न कहीं वो आम आदमी ठगा सा महसूस कर रहा है जिसने आम आदमी पार्टी से आस लगा रखी थी कि अब उसे उसके हिस्से की बिजली मिलेगी, पीने का पानी मिलेगा और रिश्वतखोरी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

दरअसल, अरविंद ने जिस जनलोकपाल बिल के पास न होने के दर्द को मुददा बनाकर इस्तीफा दिया है उस दर्द का सच कुछ और ही है । अरविंद कभी ये चाहते ही नहीं थे कि स्वराज बिल और जनलोकपाल बिल पास हो जाए । क्योंकि अगर ऐसा होता तो वे मुद्दाविहीन हो जाते। इसलिए जनलोकपाल और स्वराज के मुद्दे को जीवित रखना इनकी मजबूरी है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी की भावनाओं को जिस तरह से आप ने अपने वायदों से कैश किया उसे सत्ता में आने के बाद पूरा करना केजरीवाल के लिए आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा हो गया था। ऐसे में उनके सामने दो ही विकल्प थे- सड़क पर उतरने के लिए विधानसभा में सियासी शहादत दें या फिर सरकार में बने रहकर जनता से किए गए अपने वादे को पूरा न करने का जोखिम लें। स्वभाविक था, केजरीवाल ने पहला विकल्प चुना। वह दोबारा जनता में जाने के लिए किसी ऐसे मुद्दे की तलाश में थे, जिससे यह माना जाए कि वह 'शहीद' हो गए हैं और अरविंद केजरीवाल की दृष्टि में जन लोकपाल से बड़ा कोई और मुद्दा नहीं था। इसीलिए वह इसी मुद्दे को आगे लेकर आ गए, ताकि दोबारा जनता के बीच जाकर यह कह सकें कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने मिलकर उनकी सरकार नहीं चलने दी, लोगों में संदेश यह भी जाएगा कि केजरीवाल ने भ्रष्टाचार की लड़ाई के लिए सरकार की कुर्बानी दे दी। क्योंकि, कांग्रेस- बीजेपी उनकी इस लड़ाई को सफल नहीं होने दे रही थी। दूसरी बात की कांग्रेस को केजरीवाल भरपूर नुकसान पहुंचा चुके हैं लेकिन सरकार से बाहर आकर आम आदमी पार्टी अब बीजेपी को निशाने पर ले सकेगी। एक बात यह भी था कि पिछले कुछ दिनों से केजरीवाल और उनकी टीम दिल्ली के स्थानीय मुद्दों में ही उलझकर रह गई थी लेकिन अब वह राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दों को लेकर विपक्षी पार्टियों पर हमला कर सकेगी।
 अब जरा एक नजर अरविंद केजरीवाल के 49 दिन के कार्यकाल पर डालें तो केजरीवाल का यह संक्षिप्त कार्यकाल विवादों से भरा रहा । शायद उन्होंने विवादों का चोला इसलिए पहना ताकि आम आदमी का ध्यान बंटा रहे और सरकार पर यह आरोप न लगे के आम आदमी की जिन बुनियादी मुश्किलों को दूर करने के लिए जनादेश मिला था, उससे भटक गए हैं । सच तो यह है कि केजरीवाल सरकार नहीं चला पा रहे थे, हर दिन वे या उनके प्यादे नई गलतियां कर रहे थे। पानीबिजली के बिल घर पहुंचने लगे थे, जिन्हें छूट का लाभ मिला वो भी निराश थे क्योंकि जितना जोरशोर मचाया गया उस हिसाब से राहत नहीं मिल रही थी और जिन्हें छूट नहीं मिली उनके बिल पहले से ज्यादा आ रहे हैं , दिल्ली में बिजली की कटौती खूब हो रही थी, बलात्कार की घटनाएं रूक नहीं रही थीं, क्राइम भी शीला सरकार की याद दिलाती थी, हर दिन नौकरियों को स्थायी करने की डिमांड तेज हो रही थी, लोग धरना प्रदर्शन कर रहे थे, मजदूर संतुष्ट नहीं थे, लोगों का समर्थन कम होता जा रहा था, जनता दरबार फ्लॉप रहा, सोमनाथ भारती प्रकरण पर सरकार बैकफुट पर रही, उल्टे सोमनाथ के समर्थन और दिल्ली पुलिस के खिलाफ दिल्ली सरकार का पूरा कैबिनेट रेल भवन के सामने धरने पर बैठ गया, कई विधायक असंतुष्ट थे, दो विधायकों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। बहुमत की आकड़ेबाजी में केजरीवाल फिसल रहे थे, जो सपने केजरीवाल ने दिखाए वो पूरे नहीं होते दिखाई दे रहे थे, साथ ही उनकी हर रणनीति भी लोगों को नाराज कर रही थी, कहने का मतलब यह है कि केजरीवाल को यह पता चल गया कि अगर कुछ और दिन वो सरकार में रहे थे उनकी सारी पोल पट्टी खुल जाएगी। वो बेनकाब हो जाएंगे, इसलिए उन्होंने इस्तीफा देकर खुद को सियासी शहादत घोषित करने लगें ।
 एक बात यह भी था कि केजरीवाल इस बात को बखूबी जानते या समझते थे कि अब मौसम भी अपना मिजाज बदलने वाला है। यानि ठंड के मौसम में बिजली और पानी कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं थी इसलिए जनता भी शांत थी, लेकिन अब मौसम गर्मी का आ रहा है और स्थिति ये है कि केजरीवाल के बिजली,पानी घरघर पहुंचाने के वादों पर अमल तक नहीं किया गया,ऐसे में केजरीवाल का पोल खुलने वाला था। आम जनता के उम्मीदों के इंजीनियर बनकर उभरे केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने पानीबिजली के मुददे पर ही सत्ता सौंपा था, लेकिन जनता एक बार फिर ठगी गई।
बहरहाल अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता को जनलोकपाल के मुद्दे पर कुर्बान कर चुके हैं और इस कुर्बानी से पहले उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस और बीजेपी के साथ-साथ कॉरपोरेट घरानों पर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है, ठीक उसी तरह जिस तरह 80 के दशक में वी पी सिंह ने लगाया था। हालांकि एक सच यह भी है कि लोकसभा चुनाव की तैयारियों के लिए उन्हें ब्रेक चाहिए था। बावजूद इसके इस पूरे घटनाक्रम को अतीत से जोड़ लिया जाए तो केजरीवाल में देश को पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह की याद आने लगी है, जिन्होंने कांग्रेस में रहते हुए पार्टी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। कांग्रेस पर अंबानी सहित कई और कॉरपोरेट घरानों का साथ देने का आरोप लगाकर जनमोर्चा नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली थी। वी पी सिंह जनता को विश्वास दिलाने में कामयाब रहें कि कांग्रेस की सरकार भ्रष्ट है,वो वी पी सिंह ही थे जिन्होंने बोफोर्स स्कैम का मुद्दा उठाया था और इसी मुद्दे पर कांग्रेस से अलग भी हो गए थे। भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर वी पी सिंह चंद सालों में ही जनता के बीच काफी लोकप्रिय हो गए और वह अपने महत्वकांक्षी सपने को यानि प्रधानमंत्री बनने में कामयाब रहें। ठीक उसी तरह अरविंद केजरीवाल भी भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री बनने के सपने संजो रहे हैं । लेकिन एक सच यह भी है कि आम जनता अतीत की भूल को दूबारा नहीं दोहराएगी। क्योंकि वी.पी.सिंह की सरकार ने जो आरक्षण और मंडल आयोग को लेकर देश में संकीर्णता और जातिवाद के घातक बीज बो दिए हैं उसकी फसलें आज भी बर्बाद हो रही हैं। ऐसे में आम जनता अरविंद केजरीवाल को दूबारा से उसी नक्शेकदम पर नहीं चलने देगी।
निश्चित रूप से अरविंद केजरीवाल में एक उम्मीद की किरण दिखी भी थी, लेकिन केजरीवाल ने इन तमाम भावनाओं के साथ साथ खिलवाड़ किया है। बीच मंझधार में दिल्ली के आम आदमी को छोड़कर आम आदमी पार्टी की सियासी चमक को बढ़ाने और प्रधानमंत्री का ख्वाब देखने वाले अरविंद केजरीवाल का यही असली सच है कि वह आम आदमी को सीढ़ी बनाकर सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठना चाहते हैं ना कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण की।
जल्द ही एक नए मुददे पर लेख आपके सामने होगा।
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Sunday, 16 February 2014

भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा तमाशा है संसद— दीपक कुमार

यह अजीब संयोग है कि बीते 13  फरवरी को जब लोकतंत्र के मंदिर संसद में तेलंगाना मुद्दे को लेकर एक सांसद मिर्च स्प्रे के जरिए अफरातफरी फैला रहे थे लगभग उसी समय मैं एक केबल चैनल पर मनोज बाजपेयीरवीना टंडन अभिनित फिल्म 'शूल' देख रहा था । हालांकि यह पहली बार नहीं था जब मैं 'शूल' देख रहा था, इसके पहले भी मैंने कई दफा इस फिल्म को देखी है । लेकिन पता नहीं क्यों इस बार ​फिल्म के एंड यानि अंत को देखने पर मेरे जेहन में एक अजीबोगरीब संतुष्टी मिली जिन लोगों ने इस फिल्म के अंत को नहीं देखा हो, उन्हें पहले यह बताना चाहूंगा कि फिल्म में मनोज बाजपेयी एक ईमानदार पुलिस अफसर समर प्रताप सिंह की भूमिका में हैं । लेकिन उनकी ईमानदारी बाहुबली विधायक बच्चु यादव ( सैयज शिंदे) के काले करतुतों में अड़गा डालती है, जो उसे नहीं भाता है और जाने अनजाने में समर के खुशियों और परिवार को वह तबाह कर देता है । आगे समर वही करता है जो एक विद्रोही व्यक्ति करता है, भरी विधानसभा में घुसकर बच्चू यादव की हत्या विधानसभा में मनोज बाजपेयी जो संवाद कहते हैं उसके याद आ रहे अंश निम्म हैं— “ बाहर जनता को आपसे बहुत उम्मीद है । उसने आपको चुनकर अपने सपने को साकार करने के लिए भेजा है । विनती है आपसे, इस पवित्र मंदिर की साख को बचा लीजिए  
बहरहाल विषयांतर होने से पहले मैं आपको बता दूं कि इस फिल्म का जिक्र मैंने यूं ही नहीं किया है । दरअसल, इस फिल्म की सार्थकता वर्तमान दौर में भारतीय संसद में चल रहे नुराकुश्ती को देखते हुए बढ़ जाती है । संसद में हाथापाई और मारपीट बहुत से देशों में होती है, लेकिन राजनीतिक विरोध की वजह से सांसदों के बर्ताव का जो नजारा 13 फरवरी, 2014 को भारत की संसद में दिखा है, वह अभूतपूर्व है । 13 फरवरी का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में बेहद शर्मनाक दिन के रूप में याद किया जाएगा । इस दिन संसद में सुबह से ही लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित की जा रही थी, जब लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण के बारे में विधेयक प्रस्तुत करने जा रहे थे, तभी आंध्र प्रदेश के सांसद एल. राजगोपाल, जिन्हें एक दिन पहले ही कांग्रेस से निलंबित किया गया था, ने मिर्च पाउडर का स्प्रे करना शुरू कर दिया जिसके कारण अनेक सदस्यों को खांसी आने लगी और आंखों से पानी गिरने लगा। इसी समय तेलंगाना समर्थकों और विरोधियों के बीच हाथापाई होने लगी और तेलुगू देशम पार्टी के सांसद वेणुगोपाल ने चाकू निकाल लिया। राज्यसभा में सभापति का माइक्रोफोन उखाड़ दिया गया और वहां भी अफरातफरी मची। बाद में कई सांसदों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। वर्तमान स्थिति यह है कि 17 लोकसभा सदस्यों को अध्यक्ष मीरा कुमार ने सदन से निलंबित कर दिया है।
इस घटना के बाद सत्तापक्ष से विपक्ष तक में निंदा करने की होड़-सी लग गयी, लेकिन क्या कोई भी दल संसद और विधानसभाओं में हंगामा करने वालों को टिकट न देने का वायदा कर सकता है? जब राजनीति में नीति, सिद्धांत और विचार की बात करने वालों के बजाय हल्ला ब्रिगेड को महत्व मिलने लगे तो सदनों की मर्यादा कैसे बची रह सकेगी? सवाल यह भी है कि जब ऐसी किसी भी स्थिति की आशंका लगातार जतायी जा रही थी, तब सरकार ने जरूरी एहतियाती कदम क्यों नहीं उठाये? ये और ऐसे ही अन्य स्वाभाविक सवाल इस धारणा को बल प्रदान करते हैं कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की मंशा लोकसभा चुनाव से पूर्व तेलंगाना बनाना नहीं, बल्कि मुद्दे को गरमाये रख कर चुनाव में भुनाना है । शायद मुख्य विपक्षी दल भाजपा को भी चुनावी दृष्टि से वही स्थिति ज्यादा अनुकूल लगती है

यह घटना संसद के लिए अभूतपूर्व हैं, लेकिन कई राज्यों की विधानसभाओं में विधायकों के बीच मारपीट, माइक उखाड़कर उन्हें हथियारों की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश और लगातार शोर-शराबा मचाने की घटनाएं होती रही हैं । इस सिलसिले में उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और जम्मू एवं कश्मीर की विधानसभाओं का चर्चा होना स्वाभाविक है । दरअसल, संसदीय प्रणाली में उसी पार्टी या पार्टियों के गठबंधन की चलती है जिसे पास बहुमत होता है । लेकिन शासक दल या गठबंधन को यह छूट नहीं है कि वह संसद की अनुमति के बिना सिर्फ इस आधार पर कानून बना ले कि उसके पास बहुमत है। संसद में प्रत्येक विधेयक पर बहस और विचार-विमर्श इसीलिए किया जाता है क्योंकि लोकतंत्र की बुनियाद एक-दूसरे के विचारों को सुनने-समझने और यदि जरूरत महसूस हो तो अपनाने की प्रक्रिया पर ही टिकी है । वह इस विश्वास पर टिकी है कि विचार-विमर्श और बहसों के दौरान यदि विपक्ष सत्ता पक्ष को अपनी बात समझाने में सफल हो गया तो प्रस्तावित कानून में बदलाव किया जा सकता है। अन्य मुद्दों पर भी विपक्ष सत्तापक्ष को और सत्तापक्ष विपक्ष को अपनी बात समझाने की कोशिश कर सके, इसीलिए संसदीय कार्यवाही में प्रश्न उठाने और उन पर चर्चा करने की व्यवस्था है
लेकिन पिछले अनेक वर्षों से भारतीय संसद में कार्यवाही कम होती है, कार्यवाही का स्थगन अधिक होता है। सदन का कामकाज रोक देना राजनीतिक विरोध प्रदर्शन का एक ऐसा हथियार बन गया है जिसका हर दल इस्तेमाल करता है, भले ही आम तौर पर उसके नेता इसकी आलोचना करें । राजनीतिक असहिष्णुता इतनी अधिक बढ़ गई है कि कोई भी दूसरे की राय सुनने और सुनकर बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है। असंसदीय आचरण को अधिकाधिक राजनीतिक स्वीकृति मिलती जा रही है और राजनीतिक पार्टियों के वरिष्ठ नेता भी इस पर अंकुश लगाने के लिए कुछ करते नजर नहीं आते। अधिकांश सत्रों में प्रश्नकाल, जिसके दौरान सांसद विभिन्न विषयों के संबंध में प्रश्न पूछ सकते हैं, बिना किसी कार्यवाही के समाप्त हो जाता है। वर्तमान पंद्रहवीं लोकसभा अपने निर्धारित समय का केवल 62 प्रतिशत ही कामकाज करने के लिए इस्तेमाल कर पायी है । सदन में अध्यक्ष पद की मर्यादा और गरिमा की किसी को भी चिंता नहीं है । अध्यक्ष भी सदन को नियंत्रित और अनुशासित करने के लिए अपने अधिकार का समुचित इस्तेमाल करने से घबराते हैं। नतीजतन संसद की प्रतिष्ठा और गरिमा लगातार कम होती जा रही है। जब आम लोग चुने हुए सांसदों का ऐसा अमर्यादित, उग्र और हिंसक आचरण देखते हैं, तो उनकी निगाह में भी उनकी इज्जत कम होनी स्वभाविक है

Thursday, 13 February 2014

भटकते युवाओं का वैलेंटाइन डे.. दीपक कुमार

 प्यार का दिन, प्यार के इजहार का दिन। अपने जज्बातों को शब्दों में बयां करने के लिए इस दिन का हर धड़कते हुए दिल को बेसब्री से इंतजार होता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं, प्यार के परवानों के दिन की, वेलेंटाइन-डे की...। प्यार भरा यह दिन खुशियों का प्रतीक माना जाता है और हर प्यार करने वाले शख्स के लिए अलग ही अहमियत रखता है। 14 फरवरी को मनाया जाने वाला यह दिन विभिन्न देशों में अलग-अलग तरह से और अलग-अलग विश्वास के साथ मनाया जाता है। पश्चिमी देशों में तो इस दिन की रौनक अपने शबाब पर ही होती है, मगर पूर्वी देशों में भी इस दिन को मनाने का अपना-अपना अंदाज होता है। जहां चीन में यह दिन 'नाइट्स ऑफ सेवेन्स' प्यार में डूबे दिलों के लिए खास होता है, वहीं जापान व कोरिया में इस पर्व को 'वाइट डे' का नाम से जाना जाता है। इतना ही नहीं, इन देशों में इस दिन से पूरे एक महीने तक लोग अपने प्यार का इजहार करते हैं और एक-दूसरे को तोहफे व फूल देकर अपनी भावनाओं का इजहार करते हैं।
लेख को आगे बढ़ाने से पहले यह जानना जरूरी है कि  कौन थे वैलेंटाइन ? दरअसल, रोम में तीसरी शताब्दी में सम्राट क्लॉडियस का शासन था। उसके अनुसार विवाह करने से पुरूषों की शक्ति और बुद्धि कम होती है। उसने आज्ञा जारी की कि उसका कोई सैनिक या अधिकारी विवाह नहीं करेगा। संत वेलेंटाइन ने इस क्रूर आदेश का विरोध किया। उन्हीं के आह्वान पर अनेक सैनिकों और अधिकारियों ने विवाह किए। आखिर क्लॉडियस ने 14 फरवरी सन् 269 को संत वेलेंटाइन को फांसी पर चढ़वा दिया। तब से उनकी स्मृति में प्रेम दिवस मनाया जाता है।

    बहरहाल, यह सच है कि  प्यार दुनिया का सबसे खूबसूरत अहसास है। जब यह अहसास सुखद है, सुंदर है, सलोना है तो क्यों इसके नाम पर सदियों से खून बहता रहा है? कभी जात-पांत के नाम पर कभी मान-सम्मान और तथाकथित प्रतिष्ठा के नाम पर। कभी अमीरी-गरीबी के अंतर के नाम पर। पर यहां मुद्दा ही दूसरा है। प्यार को छलने वाला समाज तो अत्याचार करने को तैयार बैठा है, कभी किसी सेना के रूप में। कभी किसी धर्म-संस्कृति के ठेकेदार के रूप में। एक अकेला प्रेम और उसे जांचने-परखने के इतने-इतने तरीके कि प्रेम भी बेचारा असमंजस में पड़ जाए कि मैं हूं भी या नहीं? लेकिन इससे पहले कि वे अपना रूप समाज के सामने प्रदर्शित करें स्वयं प्रेमियों के मन में एक सवाल है, उन्हें स्वयं नहीं पता कि जो उन्हें हुआ है वह प्यार है भी या नहीं? प्यार की शुद्धता और सहजता से अनजान आज के प्रेमी इस सवाल से जूझ रहे हैं कि कोई आए और उन्हें यह बताए कि 'हां, यही प्यार है।'
प्रेम, प्यार, इश्क, लगाव, प्रीति, नेह, मोहब्बत, आशिकी, इस मीठे अनूठे अहसास के लिए बहुत से शब्द हैं। यह सागर से भी गहरा अहसास होने के बावजूद आज तक अनाभिव्यक्त है । प्रेम जो ना किसी से दबाव से करवाया जा सकता है और ना ही किसी दबाव से उसे रोका जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आज भी प्रेम के मायने वैसे ही हैं जैसे हम पढ़ते-सुनते आए हैं। असलियत तो ठीक इसके उलट है। प्रेम दिवस के लिए विशेष रूप से इसे बगीचों में उपजाया भी जा रहा है और बाजार यानि हाट, उसकी तो पूछिए ही मत। हाट में यह इतना हॉट है कि इसके अलावा तो कुछ बिकता दिखाई ही नहीं देता।
लेकिन एक सच यह भी है कि इस डे के जरिए नशे, वासना और भोग का एक बहाना भी मिल गया है। जी हां वैलेंटाइन डे का खुमार युवाओं में इस कदर चढ़ चुका है कि वो अपनी हदें पार करने लगे हैं। करीब डेढ़ दशक पहले जब वैलेंटाइन डे का खुमार भारत के शहरों पर चढ़ा तो गुलाब के फूलों की बिक्री फरवरी माह में 5 गुना बढ़ गई। कल गुलाब के फूलों की बिक्री तीन गुनी हुई थी, आज कंडोम की बिक्री में उतनी ही बढ़ोत्तरी दर्ज हो रही है। 2014 यानी इस साल कितनी बिक्री हुई, यह तो दो दिन बाद आने वाले आंकड़े बता देंगे, लेकिन पिछले साल की बात करें तो ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल स्नैपडील डॉट कॉम ने ही भारत में एक दिन में डेढ़ लाख कंडोम बेचे थे। वो भी 14 फरवरी के दिन। कंडोम कंपनी ड्यूरेक्स से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार वैलेंटाइन डे के दिन कंडोम की बिक्री 25 फीसदी तक ज्यादा होती है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में मल्टी नेशनल रिटेल कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट बेचने के लिये भारत में वैलेंटाइन डे एक त्योहार के रूप में इंजेक्ट किया। इस इंजेक्शन का यह रूप देखने को मिलेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। वहीं आज के दिन पब में जाने वाले यंगस्टर्स की भी कमी नहीं है। पब और ड्रिंक के जरिए जिस तरीके से वासना और उत्पीड़न का खेल खेला जाता है उसने भी इस डे या यूं कहें आज के प्यार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। क्योंकि प्यार का मतलब, हवस कभी नहीं हो सकता। वर्तमान दौर में सेक्स संबंध स्थापित करने की प्रेरणा देनेवाला वैलेंटाइन डे प्यार का संदेश कभी नहीं दे सकता। न ही प्यार का मतलब कभी समझा सकता है। वेलेंटाइन डे के मौके पर एक-दूसरे को प्यार जताने वाले युवाओं में कभी आत्मीयता का संचार नहीं हो सकता। वेलेंटाइन डे हवस की पूर्ति के लिए सिर्फ एक समझौता बन कर रह गया है, जिसका मतलब जीवन भर पछताना ही होता है।