Sunday, 26 January 2014

अब 'आप' ने दुखी कर दिया है… दीपक कुमार

पिछले साल के अंत में जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो मेरे जैसे तमाम लोगों ने अरविंद केजरीवाल में अपने हर सपने देखें या यूं कहें संजोए भी। तभी तो अचानक  आम आदमी का जनसैलाब 'आप' की टोपी पहनने के लिए बेताब हो गया । जिसमें समाज के हर तबके ने आम आदमी पार्टी में देश के सुनहरे भविष्य की उम्मीद से खुद को 'आप' से जोड़ा। लेकिन जब अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की सत्ता को अपने ढ़ग से चलाना शुरू किया तो एक  ही झटके में आम आदमी के सारे अरमान बिखर गएं। अब यह चर्चा का विषय हो सकता है कि यह  'आप' की अनुभवहीनता का रिजल्ट है या अति उत्साह का। 
बहरहाल हमें यह समझना जरूरी है कि आखिर क्यों 'आप' ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी है ? क्या वजह है कि आम आदमी पार्टी से लोगों का भरोसा डिगने लगा है?  या फिर क्यों आम आदमी पार्टी सड़कों से सत्ता को चलाने में विश्वास कर रही है? अगर 'आप' के नजर में लोकतंत्र का मतलब सड़क से सत्ता चलाना होता है तो यह गलत नहीं है। लेकिन  साथ ही लोकतंत्र का मतलब यह भी  बिल्कुल नहीं होता कि सत्ताधारी अपनी ग​लतीयों, अपनी नाकामयाबियों, अपनी असफलता को छुपाने के लिए सड़क पर आकर जनता को बेवकुफ बनाना शुरू कर दे।
जिस तरीके से अपने ही कानून मंत्री सोमनाथ भारती मंत्री को बचाने के लिए अरविंद केजरीवाल सड़क पर आए उसके बाद से यह सवाल उठने लगा है कि क्या अरविंद केजरीवाल की ईमानदार, जनता के हित में सोचने वाले नेता की गढ़ी हुई छवि को नुकसान पहुंचा है? क्या दिल्ली पुलिस के कुछ कर्मियों पर कार्रवाई की मांग करते हुए दो दिनों तक धरने पर बैठने की वजह से 'ब्रैंड केजरीवाल' को झटका लगा है?

इन सवालों के जवाबों की उम्मीद न करते हुए यह मानना ही होगा कि वैकल्पिक राजनीति का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनकी राजनीति को रोल मॉडल के रूप में अब तक देखते रहे कई लोग अब ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। सोशल मीडिया, मीडिया और सार्वजनिक बहसों में कई लोग जो 'केजरीवाल छाप' राजनीति के समर्थक रहे हैं, अब निराश हैं। अब कई बुद्धिजीवि अरविंद केजरीवाल के धरने पर बैठने के फैसले की तीखी आलोचना कर रहे हैं। इतना ही नही अब तो अरविंद केजरीवाल को 'राजनीति का लंपटवाद' या 'अराजकतावादी' , 'येड़ा', 'शहरी नक्सली' जैसे नामों से भी नवाजा जाने लगा है।
अरविंद केजरीवाल का धरना खत्म तो हो चुका है। लेकिन सवाल यह है कि जनता को इसे धरने से परेशानी के अलावा मिला क्या है? क्योंकि केजरीवाल का धरना 'आप' के दो मंत्रियों सोमनाथ भारती और राखी बिड़ला की दिल्ली पुलिस से हुई नोंकझोंक को लेकर था। हालांकि, उन्होंने इसे दिल्ली पुलिस पर दिल्ली सरकार के नियंत्रण का मुद्दा बना कर बड़ा रूप देने की कोशिश जरूर की। लेकिन, जिस तरह मांग पूरी हुए बिना धरना खत्म कर दिया और इसे जनता की जीत बता दिया, उससे उनकी आलोचना ही हो रही है। क्योंकि जनता भी समझ रही है कि यह लड़ाई जनता की नहीं थी  बल्कि यह लड़ाई अरविंद केजरीवाल की अपने मंत्रियों को बचाने के लिए थी। एक बात यह भी है कि केजरीवाल की अपील के बावजूद उतनी बड़ी संख्या में लोग धरने में शामिल नहीं हुए। जिस वजह से भी केजरीवाल को धरना खत्म करनी पड़ी।
अब सवाल यहां यह भी है कि सोमनाथ भारती की पुलिस से झड़प हुई क्यों? दरअसल, दिल्ली के कानून मंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता सोमनाथ भारती के मुताबिक दिल्ली के खिड़की एक्सटेंशन इलाके में अफ्रीकी मूल के लोग सेक्स रैकेट और ड्रग्स का धंधा चलाते है लेकिन पुलिस कार्रवाई नहीं करती है, जिससे स्थानीय नागरिक परेशान हैं। लेकिन स्थानीय नागरिकों की परेशानी कुछ और ही है। दरअसल, हमारे देश में अफ्रीकी मूल के लोगों के प्रति नाराजगी बहुत पुरानी है। होता यह है कि अफ्रीकी मूल के निवासी अपने तौर तरीकों से लाइफ को जीना पसंद करते हैं, जो जायज भी है। लेकिन हमारे यहां के नागरिकों को उनके चालचलन बिल्कुल जंगली जानवरों जैसे लगते हैं। हमारे यहां  उन्हें गुलाब जामून, रसगुल्ले, सुअर जैसे शब्दों से नवाजा जाता है और उन्हें चिढ़ाया जाता है। ​उनके लाइफ स्टाईल से लोग चिढ़ते हैं और शायद इसी वजह से खिड़की एक्सटेंशन के स्थानीय निवासियों का समर्थन सोमनाथ भारती के साथ है। लेकिन क्या यह सही है?  क्योकि हर देश में, हर समाज में अच्छे-बुरे लोग रहते हैं । कई देशों में हमारे देश के लोगों की भी आलोचना होती है। दुर्भाग्य तो यह है कि हमारे देश में ही हमारे लोगों को पराया बनाया जाता है। बावजूद इसके हम 'वसुधैव कुटुम्बकम्' जैसे जुमलों से अपना मन बहलाते हैं। लेकिन सत्ता में बैठे लोग भी जब इस तरह से विदेशी मूल के लोगों के प्रति दुर्व्यवहार करेंगे तो क्या यह जायज है? एक अच्छे राजा का प्रजा को समानता की नजर से देखने का जो धर्म होता है, उसे निभाना ही चाहिए। लेकिन सोमनाथ भारती के साथ- साथ दिल्ली की 'आप' सरकार भी इस धर्म को निभाने में नाकामयाब रही है।
 सबसे अलग की छवि के साथ राजनीति में शानदार शुरुआत करने वाले 'आप' के नेताओं की ऐसी कई हरकतें सामने आई हैं, जिनकी उम्मीद 'आप' से नहीं थी। पहले ही 'आप' के कई नेता और मंत्री विवादित बयानों को लेकर दिल्ली पुलिस ही नहीं, जनता के निशाने पर भी आ चुके हैं। अब सवाल है कि केजरीवाल ने तो अपना धरना अपनी मांग पूरी हुए बिना ही खत्म कर दिया, लेकिन धरना खत्म होने की असली वजह क्या है ? असली वजह कुछ और ही है। इस धरने को लेकर खुद को अराजक कहने वाले केजरीवाल ने सबसे पहले दिल्ली के कुछ पुलिसवालों  को सस्पेंड करनी की मांग की थी। लेकिन बाद में उन्होंने इसमें ढील देते हुए कहा कि इन पुलिसवालों का तबादला कर दिया जाए। लेकिन केंद्र सरकार ने इनमें से कोई भी मांग नहीं मानी। तो ऐसे में क्यों न मान लिया जाए की केजरीवाल ने यह धरना जनता को गुमराह करने के लिए किया था।
क्योंकि यह सच है कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल हर मोर्चे पर फेल नजर आने लगे हैं। मसलन, अपने कहे अनुसार उन्होंने बिजली के दाम 50 प्रतिशत घटाएं जरूर लेकिन साथ ही बिजली के सप्लाई को भी घटाया है। उसी तरह पानी के साथ भी ऐसा ही हुआ है। यानि घोषणाएं तो बहुत कर चुके हैं लेकिन उन सब को अमली जामा पहनाने में वह अब भी नाकामयाब हैं।
तो ऐसे में यह मानना ही पड़ेगा कि केजरीवाल जनता को बेवकुफ बना रहे हैं। क्योंकि उनको पता है कि लोकसभा चुनाव की घोषणा होते ही चुनाव आचार संहिता का बहाना लेकर वह किसी भी तरह के जनहित के काम नहीं कर पाएंगे। तब तक शायद कांग्रेस समर्थन खिंचने की तैयारी भी कर ले।
वर्तमान में अरविंद केजरीवाल की जो छवि बनी है, उसके मुताबिक वह एक घमंडी, जिद्दी, उतावले, खुदगर्ज, लंपट और अराजक राजनेता लगते हैं। इनमें से एक अराजकता का तमगा तो उन्होंने खुद ही ले लिया है, मालूम हो कि केजरीवाल ने रेल भवन के पास शास्त्री पार्क में धरने के दौरान खुद को अराजकतावादी कहा था। देश के अन्य राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों से खुद को जोर देकर अलग बताने वाले केजरीवाल की छवि चंद महिनों में ही 'धूमिल' हुई है। जिसने जनता को एक बार फिर से उसी रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से उम्मीदों की 'आप' की शुरूआत हुई थी। उम्मीदों का इतनी जल्दी बिखर जाने से जनता नराज भी है और निराश भी। 
दिल्ली में 28 दिसंबर, 2013 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले तक अरविंद केजरीवाल की छवि एक ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता और नेता के तौर पर लोगों के दिलों में जगह बना चुकी थी जिसमें लोग उन्हें जनता के हित के लिए लड़ते, भूख हड़ताल करते, पुलिस की लाठियां खाते, सड़कों पर दिन-रात बिताते, सोचने पर मजबूर करने वाली बातें करते हुए सुनने, देखने और पसंद करने के आदी बनते जा रहे थे। उनकी छवि एक ऐसे शख्स की थी जो समाज की हर बुराई से लड़ने को तैयार था। वह राजनीति, प्रशासन, नौकरशाही, न्यायपालिका, पुलिस में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। यह वही दौर था जब जन लोकपाल कानून की मांग कर रहे केजरीवाल सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों की भलाई के लिए लड़ते दिखते थे। एक राजनेता के तौर पर लोगों को केजरीवाल से वही उम्मीदें थीं जो खुद केजरीवाल को बीजेपी और कांग्रेस के नेताओं से थीं कि वे ईमानदार, कानून और नागरिकों के हक को सम्मान देने वाले और भारत के लोगों के दर्द और दिक्कतों को समझने वाले नेता बनें। लेकिन अब सब कुछ उल्टा हो गया है। अब केजरीवाल भी परंपरागत राजनीति करने वाले नेताओं की तरह कानून की अनदेखी करने वाले, विरोधियों को धमकाने और हड़काने वाले, देश की राजधानी में अराजकता फैलाने वाले, केंद्रीय गृह मंत्री के लिए अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करने वाले और गणतंत्र दिवस जैसे अहम और ऐतिहासिक आयोजन में बाधा डालते हुए दिखने और इस अवसर के बारे में आपत्तिजनक बातें करने वाले और अपने मंत्रियों को बचाने वाले, पारंपरिक नेताओं के बयानों को दुहराने वाले नेता बन गए हैं।
'आप' को है सलाह की ज़रूरत
दरअसल, आम आदमी पार्टी को अनुभव नहीं है और उन्हे लगता है कि वह सही है, किसी से सलाह लेने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन सच है कि आम आदमी पार्टी का संगठन नहीं है,  उसमें लोग मनमानी से बोलते हैं, उन्हें रोकने के लिए कोई नहीं है,  आपस में लोग लड़ रहे हैं, एक महीने में ही एक एमएलए असंतुष्ट हो गए और उसे  पार्टी से निकाल दिया गया, आम आदमी पार्टी में कुछ लोग हैं जो सलाह दे सकते हैं लेकिन सलाह देना एक अलग बात है और काम करना अलग। एक और ख़तरनाक बात है कि ये पता लगाना मुश्किल है कि जो लोग पार्टी में आ रहे हैं वो भ्रष्ट हैं या ईमानदार हैं। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता तो समझते हैं कि क्या करना है, केजरीवाल भी वरिष्ठ नौकरशाह हैं, वो जानते हैं कि सरकार कैसे चलती है, लेकिन यह जानना कि सरकार कैसे चलनी चाहिए और चलाना कैसे है, ये अलग बात है। जिसमें अब तक आम आदमी पार्टी नाकामयाब है। केजरीवाल को यह समझना होगा कि अब वह बात बात पर सड़क पर आ जाने वाले आम आदमी नहीं हैं, अब वह मुख्यमंत्री हैं। उनके पास सत्ता है, उनके पास शक्ति है। वह चाहते तो दिल्ली पुलिस के इस रवैया के खिलाफ अदालत भी जा सकते थें। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, उन्हें तो अराजक बनना ही अच्छा लगा।

वामवाद के अनुसार 'क्रांति सतत चलने वाली प्रक्रिया है और असली विद्रोही वह है जो छह महीने बाद अपनी कुर्सी ख़ुद उलट दे।' तो क्यों न यह मान लिया जाए कि अरविंद केजरीवाल भी इसी राह पर चल रहे हैं। यानि कि अरविंद केजरीवाल के मंसूबे सही नहीं हैं। वह देश में एक नए तरह के वामवाद को लाना चाहते हैं, जो सत्ता को तहसनहस करना चाहता है। तभी तो अब तक सत्ता पाने के लिए बेचैन अरविंद अब खुद ही उसे ​बिखेरने में लगे हैं। अगर वह ऐसे ही करते रहें तो लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है, देश में भयानक अशांति फैल सकती है। लेकिन हमें यह विश्वास है कि अरविंद केजरीवाल के इस मंसूबे को जनता कामयाब नहीं होने देगी।


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Saturday, 18 January 2014

मैदान से बाहर क्यों हैं राहुल गांधी ?

पिछले दिनों तालकटोरा स्टेडियम दिल्ली में हुई कांग्रेस पार्टी की अखिल भारतीय कार्यकारी समिति की बैठक में जो निर्णय लिया गया, उसने पर्यवेक्षकों को ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय विपक्ष को भी हैरानी में डाल दिया है। अब तक ऐसा लग रहा था कि एक अनुभवी राजनेता और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार यानी नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए कांग्रेस पार्टी के 'युवराज'  राहुल गांधी तैयार हैं। बेशक, राहुल गांधी को राजनीति का कोई ख़ास अनुभव नहीं है, बेशक देश के तमाम मुद्दों पर चुप रहने का अनुभव है, बेशक उन्हें कांग्रेस का "राजकुमार" भी कहा जाता है, लेकिन सभी लोग यही उम्मीद कर रहे थे कि राहुल गांधी को कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना तय है। विपक्षी नेताओं को भी ऐसा ही लग रहा था कि राहुल गांधी को उम्मीदवार घोषित किया जाएगा और उन्हें यह कहने का एक बहुत अच्छा मौका भी मिल जाएगा कि राहुल को "ऊपर से लादा गया" है। लेकिन, अंतिम वक्त में पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गांधी ने हस्तक्षेप किया और कहा कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं बनेंगे। उन्होंने बैठक में तमाम अफवाहों को विराम देते हुए राहुल गांधी को उनके दायरे को बताया या यूं कहें समझाया। अब अंतिम निर्णय यह हुआ है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होंगे लेकिन वह आगामी संसदीय चुनावों में कांग्रेस पार्टी के चुनाव अभियान का नेतृत्व ज़रूर करेंगे।
लेकिन सवाल वही जीवंत है कि आखिर राहुल को प्रधानमंत्री पद के तमगे से सोनिया गांधी ने दूर क्यों रखा? दरअसल, सोनिया गांधी को यह एहसास हो चुका है कि पिछले साल भाजपा के गोवा में हुए अधिवेशन के बाद से नरेंद्र मोदी नाम का जो चेहरा तुफान की तरह आगे बढ़ रहा है उसमें कांग्रेस के अच्छेअच्छे धुरंधर उड़ने वाले हैं। जिसका उन्होंने डेमो हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन से देख लिया है। भाजपा के 4 राज्यों की धमाकेदार जीत ने कांग्रेस के हर चाल को बिगाड़ दिया है। तभी तो कल तक सत्ता का स्वाद चखने को आतुर राहुल गांधी आज पार्टी में किसी भी भूमिका को लेने के लिए तैयार है। यानि पहली बार कांग्रेस अपने आचरण के अनुकुल व्यवहार नहीं कर पा रही है। वर्ना कांग्रेसी परंपरा को टटोले तो वंशवाद सत्ता के काफी करीब रहा है। कांग्रेस के लिए राहुल गांधी चाहें कुछ भी हों लेकिन उनका सच कुछ और ही हैं। तभी तो कांग्रेस के घोषित युवा राहुल गांधी आज देश के युवाओं के लिए आईकन नहीं बल्कि शर्मिंदगी बन गए हैं।
एक तर्क यह भी गढ़ा जा सकता है कि हाल ही में कांग्रेस की सहयोगी आम आदमी पार्टी के नेता और हीरो माफिक कवि कुमार विश्वास अमेठी में रैली के दौरान  कांग्रेस पर चुनाव लड़ने की वंशवाद और भाई-भतीजावाद परंपरा का आरोप लगाया था, तो शायद इस वजह से अपने बेटे राहुल को लेकर सोनिया गांधी डर गई हैं। क्योंकि कांग्रेस की ओर से अमेठी में हमेशा नेहरु-गांधी परिवार का सदस्य या उनसे जुड़ा करीबी ही चुनाव लड़ता रहा है। यहां से संजय गांधी, राजीव गांधी, राजीव गांधी के करीबी रहे सतीश शर्मा, सोनिया गांधी और फिर राहुल गांधी चुनाव जीतते रहे हैं। ऐसे में सोनिया कांग्रेस को डर है कि यदि वह राहुल गांधी को पीएम उम्मीदवार घोषित करती, तो इससे विपक्षी पार्टियों द्वारा वंशवाद का विरोध करने का मुद्दा और गरमा जाता, उनका डर जायज भी है। क्योंकि वंशवाद की अतिरेक कर चुकी सोनिया कांग्रेस के इस स्वार्थी कदम को जनता माफ नहीं करती।        

इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस के पास कोई चुनावी मुद्दा बचा नहीं है। ​क्योंकि भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपना पीएम उम्मीदवार घोषित कर लोगों के सामने उनके गुजरात के विकास मॉडल और सुशासन का मुद्दा रख दिया है। वहीं कांग्रेस की सहयोगी 'आप' के अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चुनावी मैदान में उतरने वाले हैं। ऐसे में कांग्रेस के पास ऐसा कोई मुद्दा नहीं है, जिसके बल पर वह चुनाव में राहुल गांधी को प्रस्तुत कर सके। कांग्रेस अगर विकास को मुद्दा बनाती है, तो वह खुद विकास को लेकर विपक्षी पार्टियों के निशाने पर है और अगर कांग्रेस भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाती है, तो यह बात सबके सामने है कि कांग्रेस के कार्यकाल में कोयला घोटाला, सीडब्यू्जी,  2जी घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला आदि जैसे कई बड़े घोटाले हुए हैं, जिसमें कई मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए हैं। वहीं कई ऐसे भी मंत्री रहे, जिन्हें जेल की हवा तक खानी पड़ी। पूरे कार्यकाल में यूपीए सरकार घोटालों और भ्रष्टाचार को लेकर विवादों में रही। हालांकि समयसमय पर दंगो का हवाला देकर कांग्रेस माहौल को बदलना जरूर चाहती है लेकिन उसके इस असफल प्रयास ने कई दफा उन्हें हार का रास्ता दिखा दिया है।  
यह भी सच है कि राहुल गांधी पार्टी में बेशक नंबर दो की स्थिति रखते हों और सांसद हों, लेकिन उनकी सरकार में बिल्कुल भी भागीदारी नहीं रही है। इस तरह उन्हें सरकार चलाने और उसमें शामिल होने का बिल्कुल भी अनुभव नहीं है। हां, इतना जरूर है कि कुछ मुद्दों पर वे सरकार की फजीहत करते नजर आए हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उस समय देखने को मिला जब उन्होंने दागियों को बचाने वाले अध्यादेश की कॉपी फाड़कर फेंक दी थी, जबकि उस अध्यादेश को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई थी। राहुल के इस रुख से सरकार को वह अध्यादेश वापस लेना भी पड़ा था। ऐसे में कांग्रेस राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल कर कोई जोखिम नहीं ले सकती थी। सोनियाकांग्रेस को भी लगता है कि राहुल के सरकार चलाने के मुद्दे मोदी के विकास के मॉडल को पीछे नहीं छोड़ सकते हैं।
एक बात यह भी है कि कुछ समय पहले राहुल ने पार्टी से दागी नेताओं को बाहर करने की बात कही थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की थी। अब यदि राहुल ऐसा करते हैं, तो इससे पार्टी में एकता की कमी का संदेश जाएगा। वहीं दूसरी ओर यह भी खबरें आती रही हैं कि वे कई राज्यों  में विभिन्न मुद्दों पर पार्टी के नेताओं से अपनी अलग राय रखते हैं। चुनाव अभियान के दौरान उन्हें कई बार पार्टी के वरिष्ट नेताओं से अलग बैठे देखा गया है। ऐसे में कांग्रेस को पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि पार्टी के सभी नेता एक हैं और वे राहुल से अलग नहीं हैं। यानि सोनिया समझती हैं कि राहुल को 'तबे एकला चलो' के राह पर ले जाना पार्टी और राहुल की फजीहत कराना ही होगा।
राहुल गांधी की पार्टी में भूमिका और उनके नेतृत्वं को लेकर भी संशय बना हुआ है। कांग्रेस अभी इस बात को लेकर निश्चिंत नहीं है कि राहुल उनके ट्रंपकार्ड हैं या नहीं। पिछले साल जिस प्रकार से राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार किया था, तब वे उम्मीद के मुताबिक भीड़ नहीं जुटा पाए थे और जो भीड़ आई उसे वे पूरी तरह वोट बैंक में नहीं बदल पाए। राहुल का चुनावी अभियान न तो भाजपा का कुछ बिगाड़ पाया और न ही भाजपा के वोट बैंक का। हद तो तब हुई जब दिल्ली में जब एक चुनावी सभा के दौरान वहां आए लोग भी बीच से उठकर जाने लगे थे। इस मामले में उस समय दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को लोगों से राहुल का भाषण सुनने का अनुरोध करना पड़ा था। इन चुनावों में कांग्रेस को करारी हार का मुंह देखना पड़ा था। ऐसे में राहुल को लेकर पार्टी का संदेह में होना स्वाभाविक है।
यानि राहुल गांधी के साथ कांग्रेस का हाथ अब ढ़ीला पड़ता जा रहा है तभी तो समयसमय पर कांग्रेस  की कथित ब्रहमास्त्र प्रियंका गांधी राहुल गांधी को सहारा दे रही है। हालांकि यह अलग बात है कि यह ब्रहमास्त्र उ.प्र के विधानसभा चुनाव में अमेठी, रायबरेली में कुछ खास प्रभावी नहीं रही थी। फिर भी उनको इस्तेमाल करने में क्या जाता है? सोनिया कांग्रेस को शायद यह भ्रम है कि प्रियंका में इंदिरा गांधी की झलक है तो ग्लैमर भी है। लेकिन सोनिया की कांग्रेस यह भूल चुकी है कि देश की जनता एक व्यापक बदलाव की तैयारी कर चुकी है। उसे विकास, सुशासन, धैर्य की नई परिभाषा देने वाला अनुभवी नेता चाहिए न कि जुगाड़पानी पर चलने वाला अति उत्साहित चेहरा।



Friday, 3 January 2014

युवाओं के रोमांस पर बुजुर्गों का तिलिस्म


रोमांस एक ऐसा शब्द है जिसको सभी अपनेअपने ढ़ग से परिभाषित कर सकते  है। शरारती चेहरे इस रोमांस को  आकर्षण  का नाम दे सकते हैं तो संजीदा और गंभीर व्यक्तित्व इसे प्यार की नईनई आकांक्षा कह सकते हैं। लेकिन इन सब के बीच एक सवाल जो महत्वपूर्ण है वो यह है कि अचानक रोमांस का प्रचलन आया कैसे? तो इसका जवाब भी अलगअलग तरह से मिल सकता है। वैसे तो युवाओं के संदर्भ में इस शब्द को जोड़ा जाता है लेकिन इसका स्पष्ट सच है कि युवाओं ने रोमांस को प्रचलन में नहीं लाया है। इसके पहले भी रोमांस प्रचलन में था। यहां यह बताना जरूरी है कि ओल्ड जेनेरेशन यानी बुजुर्ग समाज भी युवाओं को रोमांस की अराजकता का दोषी मानते हैं। उनके अनुसार यंग समाज ने ही रोमांस को जन्म भी दिया है और उसे अपने ढ़ग से वह परिभाषित भी करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस शब्द का प्रचलन हमारे अतीत के जेनेरेशन में नहीं रहा होगाबुजुर्गों ने भी अपने दौर में रोमांस किया ही होगा। यह एक अलग बात है कि हमारी संस्कृति और सभ्यता यह इजाजत नहीं देती की हम अपने अतीत के जेनेरेशन से इस मुद्दे पर कोई सवाल पूछें या कोई चर्चा करें। तो फिर यहीं से सवाल यह भी उठता है कि उन्हें क्या यंगस्टर्स के रोमांस पर कोई सवाल करने का हक है? इस सवाल को अगर भावनात्मक जवाब मिलता है तो हमे भी यह समझना ही होगा कि दरअसल यह हमारे हित की ही बात होगी। अगर नहीं समझे तो परिवार और समाज के लिए आप एक कलंकित चेहरा होंगे। यह सवाल परिवार तक अगर सीमित हो तो समझ में आता है लेकिन अब यह सवाल समाज के बुजुर्गों में वायरस की तरह फैल चुका है।    

 मतलब यह कि  वह तय करने लगे हैं कि यंगस्टर्स रोमांस कैसे करें। तो क्या अब वह तय करेंगे कि युवा रोमांस कैसे करे! तो क्या उन्हें यह हक कानूनी रूप से मिला है? या फिर वह बेवजह अड़चन लगाने में खुद को बहादूर समझना चाहते हैं? या फिर वह अपनी गलियों- मुहल्ले या समाज की सफाई का ठेका उठा रखे हैं  या समाज की सफाई करना चाहते हैं? क्योंकि अगर हम कहें कि जो अड़चन लगाते हैं उनकी नियत में  महिला समाज को लेकर खोट नहीं है तो यह बात हास्यास्पद होगी। यहां यह समझना जरूरी है कि क्या युवा भी सही ढ़ग से रोमांस को परिभाषित कर रहे है? क्योंकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि युवाओं ने जिस तरीके से सड़कों पर रोमांस करना शुरू किया है उससे हमारी संस्कृति और सभ्यता का हनन भी हो रहा  है। पैसे और समयसमाज के बंदिशों में जकड़े युवाओं के लिए पार्क और सड़क या सार्वजनिक स्थल ही पवित्र स्थल बन चुका है ।      
लेकिन सवाल यह है कि आखिर युवाओं के सड़करोमांस से उन्हें तकलीफ क्यों है? क्योंकि ऐसा भी नहीं है कि आज के बुजुर्गों ने अपने अतीत में इस तरह की हरकत नहीं की होगी। चंद समय के लिए यह मान लिया जाए कि वह स्वच्छ समाज की परिकल्पना करना चाहते हैं तो यह बात गले से नीचे नहीं उतरने वाली है। क्योंकि जिस दौर में इन्होंने तरहतरह के कांड किए होंगे उस दौर में आवाज उठाने की परंपरा नहीं रही होगी। या आज के दौर में भी व्यापक स्तर पर नाबालिग लड़कियों  का इस्तेमाल अगर करता है तो वह बुजुर्गों का ही एक बहुत बड़ा समुदाय है। इसमें होता यह है कि पीड़ित लड़की अपनी मजबूरी और उस चेहरे की समाज और परिवार में जमी हुई पैठ के सामने जीरो जाती हैं और जिस वजह से उसे मजबूरी में खुद को लूटते हुए देखना भी पड़ता है।
लेकिन समय बदला है अब यह समाज उन पीड़ितों को रोक नहीं सकता है और बंदिशों के जंजाल को इन लड़कियों ने तोड़ा भी है। तभी तो पहली दफा धर्म के ठेकेदार आशाराम इन्हीं करतूतों में जेल में पहुंच चुके हैं  तो वहीं मीडिया के जीनियस मैन या स्टिंग किंग तरूण तेजपाल भी कुछ ऐसे ही कांड में इसी दौर में जेल में हैं। तो वहीं न्याय के मालिक जस्टिस गांगुली भी इन्हीं चक्कर में अपने पदप्रतिष्ठा को धूमिल होने से बचाने में लगे हैं। अगर इन सब के उम्र पर गौर किया जाए तो ये  55 बसंत देख चुके हैं।

             
ये तो बात हुई अधेड़ बुजुर्गों की। अगर बात की जाए प्योर बुजुर्गों की तो उसमें एनडी तिवारी का नाम लेना जरूरी होता है। क्योंकि मुख्यमंत्री से लेकर राज्यपाल तक के कुर्सी का सुख भोग चुके तिवारी जी ने उम्र के 80 वें पड़ाव या यूं कहें आखिर पड़ाव में भी सेक्स का सुख भोगते हुए पकड़े जा चुके हैं। हद तो तब हुई जब न्यायालय के आदेश के बाद उन्हें अपने परिवार को पहचानने वाले डीएनए टेस्ट भी देना पड़ा। वहीं कांग्रेस के एक और बड़े नेता अभिषेक मनु सिंधवी भी 60 बसंत पार तो कर चुके हैं लेकिन वह भी कुछ ऐसे ही आरोपों में घिरे हैं। ऐसे और भी कई उदहारण हैं।
लेकिन इन सब के बीच सवाल यह है कि बुजुर्गों की टीस है कहां? और क्यों  दरअसल, आज के दौर में युवाओं ने बुजुर्गों को हाशिए पर ढ़केल दिया है। इसी दौर में पहली दफा बुजुर्गों समाज को फॉलो करने की परंपरा भी कहीं दूर छुट गई है। तो इसी दौर में उनसे सलाह लेने की परंपरा भी हाशिए पर चली गई है। मतलब साफ है कि यंग जेनेरेशन अब बुजुर्गों के पीछेपीछे चलने वाली परंपरा को ही खत्म कर दिया है। इसी दौर में अब यह बात पुरानी हो चुकी है कि आज के युवा, बुजुर्गों से कोई रायमशवरा करें। अब आज के युवा अगर किसी बात को जानना या समझना चाहते हैं तो उनके लिए ईनेट और उनकी यारियां ही उनके सवालों का जवाब दे दती है। मतलब साफ है कि आज के दौर में यंग और ओल्ड जेनेरेशन में कोई लगाव रह नहीं गया है। न ही अब वह जेनेरेशन मौजूद है जो नानीदादी के पास बैठ कर सर पर चंपी कराते हुए उनके गूजरे कल और किस्सों कहानियों को सुनता था और न ही वह जेनेरेशन मौजूद है, जो बुजुर्गों के खट्टेमीठे अनुभव को सुनता  और समझता था।  तो ऐस में यह क्यों न मान लिया जाए कि युवाओं को अब बुजुर्गों से कोई मतलब रह नहीं गया है! आज उनके लिए जरूरी उनके अतीत की जनेरेशन नहीं है बलिक उनके लिए जरूरी सोशलसाइट्स पर स्टेटस अपडेट करना है और व्हाटस अप या आक्र्यू के जरिए रोमांस की नई परिभाषा गढ़ना है। ऐसे में बुजुर्गों को लंबी खाई स्वभाविक रूप से दिख रही है। क्योंकि उन ओल्ड जेनेरेशन के पास एक्सपीरियंस रूपी चश्मा भी है जिसके जरिए वह अपने और युवाओं के भविष्य की परिकल्पना कर सकते हैं और करते भी हैं।  
तो दूसरी तरफ यह भी सच है कि 50 के उम्र को पार कर चुके उम्रदराज लोगों को घर बिठाने वाले युवा ही हैं। बात चाहे राजनीति की हो या फिर किसी और क्षेत्र की तो सच यह है कि जहां फिल्मीं दुनिया में अमिताभ बच्चन की एक्टिंग को विराम लगाया वो और कोई नहीं उस दौर के युवा शाहरूख खान ने ही लगाया। तो आज के उम्रदराज एक्टर शाहरूख के पर्दे के रोमांस से ध्यान अगर किसी ने हटाया तो इस दौर के रोमांस किंग और यूथ आईकन रणबीर कपूर ने। वहीं खेल जगत में जहां क्रिकेट के किंग विराट कोहली से लेकर बैंडमिंटन की क्वीन सायना नेहवाल या कुश्ती के हीमैन सुशील कुमार से लेकर टेनिस स्टार रोहन बोपन्ना तक इन सब ने आज ओल्ड जेनेरेशन को ठेंगा दिखाते हुए खाप के फतवों और नियम कानूनों को ताख पर रखा है। तो सच है कि मानवीय व्यवहार के अनुसार जलन होना स्वभाविक है।   दरअसल, पहली बार ऐसा हुआ है जब युवा अपने अनुसार सत्ता और समाज का रेखाचित्र खींच रहे हैं। तभी तो पहली दफा छोटेछोटे मुददों को लेकर सरकार को चुनौती देने के लिए सड़क पर आ जाते हैं। वर्ना यह दूर की गोटी थी कि बुजुर्गों के नेतृत्व में 16 दिसंबर गैंगरेप पीडित को इंसाफ के लिए विरोध हो। क्योंकि वह बारबार अपने स्वास्थ और डर भरे अनुभवों के दम पर खुद तो रूकते ही हैं साथ में युवाओं को भी रोकने की चाहत में रहते हैं।  और यह भी सच है कि आज युवा बाहर निकले हैं तभी चुनावों में वोटिंग का प्रतिशत भी बढ़ा है। वर्ना बुजुर्ग इसे एक फेस्टिवल के रूप में मनाने के आदि हो चुके हैं।

मतलब यह कि  आज युवाओं ने ओल्ड जेनेरेशन को खुद से जिस तरीके से दूर किया है उससे उनमें यह टीस होना स्वभाविक है कि वह यूथ के हर एक्टिविटी को फॉलो भी करें और आलोचना भी करें। शायद उनका गुस्सा खुद के परिवार पर न उतर पाता हो, शायद इसके पीछे उनके बेघर होने का डर रूपी स्वार्थ छिपा हो तो अब वह भी सड़कों पर चल रहें प्रेमी युगल को अपना निशाना बनाना सही समझते हैं। क्योंकि उन्हें भी पता है कि यह प्रेमी युगल अपने परिवार से छुप कर रोमांस करना पसंद करते हैं तो वो भी इसके विरूद्ध आवाज उठाने से कतराते हैं।
ऐसे में अब वक्त आ गया है कि यूथ यह तय करें कि उनके लिए क्या सही है? क्या रोमांस की वजह से खुद पर हो रहे हमलों को बर्दाशत कर सकते हैं? क्योंकि यह भी सच है कि युवा इतनी आसानी से किसी के तल्ख तेवर और बात न सुनते हैं और न ही देखना चाहते हैं। उनके पास हर मर्ज का दवा भी होता है और ईलाज भी। लेकिन समझना यह भी है कि उनके चुप रहले की वजह उनकी सहयोगी होती है। यानी आज के संदर्भ में कहें तो गर्लफ्रेंड। तो युवा इस वजह से अपने उपर हो रहे हमलों को बर्दाशत भी करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि इसकी अहमियत को उनकी सहयोगी कितना समझती हैं? तो जवाब यह है कि वह उसे एक कॉमेडी से लोटपोट कर देने वाला हादसा समझती हैं। ऐसे में युवाओं को यह समझना होगा कि वो जिस रास्ते पर जा रहे हैं क्या वह रास्ता उनके हित का है? और क्या वह रास्ता ही उनके हित का है? सच है िक कुर्बानी और प्यार जैसे शब्दों के मायाजाल में युवा पड़ चुके हैं क्योंकि उसके आगे उन्हें कुछ न दिखता है और न ही कुछ सुझता है। ऐसे में वाजिब सवाल है कि ये रास्ता सही मंजिल की ओर जाता है क्या