Wednesday, 8 November 2017

बिग बॉस या बंदिश!



अगर आपसे कोई सवाल पूछे कि कौन सा ऐसा शो है जो परिवार संग देखना पसंद नहीं करेंगे? तो इस बात की अधिक संभावना है कि आपका जवाब कलर्स का चर्चित शो ‘बिग बॉस’हो। दरअसल, बिग बॉस एक ऐसा शो है जिसके जरिए चैनल द्वारा दर्शकों के बीच फूहड़ता और विवाद को बेहद ही चटपटे अंदाज में परोसा जाता है। शो के मेकर्स भी इस सच को मान चुके हैं कि जितने विवाद जुड़ेंगे, टीआरपी उतनी ज्यादा मिलेगी। यही वजह है कि हर सीजन में कंटेस्टेंट को सेलेक्ट करने से पहले बेहद रिसर्च किया जाता है। इस रिसर्च के जरिए यह पता लगाया जाता है कि कंटेस्टेंट कितना विवादित है।

इसके अलावा इस बात पर भी गौर किया जाता है कि कौन सा कन्टेस्टेंट सबसे ज्यादा फुटेज ले सकता है। यह भी सच है कि बिग बॉस के अब तक के सफर में चैनल ने शो के साथ हर तरह के प्रयोग किए। शो के होस्ट में बदलाव से लेकर कॉमनर्स की घर में एंट्री तक इन्हीं प्रयोगों की एक बानगी है।

स्वामी ओम और बिग बॉस

मसलन, पिछले सीजन में स्वामी ओम जैसे विवादित कॉमनर्स को ‘बिग बॉस’ के घर में एंट्री दी गई। जब स्वामी ओम घर में पहुंचे तब उनकी हरकतों को देखकर देशभर के लोग हैरान थे। खुद को संत बताने वाले स्वामी ओम को लोगों ने घर के अंदर अश्लीलता के अलावा लड़ाई करते हुए भी देखा।
इससे स्वामी ओम को पॉपुलैरिटी तो मिली ही उसके साथ ही शो की टीआरपी भी अच्छी रही। शो से बाहर किए जाने के बाद स्वामी ओम ने बिग बॉस और होस्ट सलमान खान की जमकर आलोचना की।

ठीक उसी तरह इस सीजन में भी कई दिलचस्प किरदार घर में रहने के लिए चुने गए। उन्हीं में से एक ​दाउद इब्राहिम के कथित रिश्तेदार जुबैर खान भी थे। जुबैर को सीजन के पहले वीकेंड पर ही घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इस दौरान शो के होस्ट सलमान खान ने उन्हें लताड़ भी लगाई। शो से बाहर होने के बाद जुबैर ने भी स्वामी ओम की तरह मीडिया में जमकर बयानबाजी की। जुबैर ने एक कदम आगे बढ़कर सलमान खान के खिलाफ केस भी कर दिया।
इस साल शो में एक और दिलचस्प किरदार की एंट्री हुई । इस किरदार का नाम ढिंचैक पूजा है। बदनाम होकर भी नाम कमाने वाली पूजा को इंटरनेट की दुनिया की नई सनसनी कहना गलत नहीं होगा।
कुछ ऐसी ही कहानी अर्शी खान की भी है। खुद को पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद आफरीदी के बच्चे की मां बताने वाली अर्शी भी इस सीजन की सबसे बड़ी ड्रामेबाज किरदारों में से है। ऐसे किरदारों के जरिए दर्शकों को मनोरंजन तो मिलता है लेकिन वो बातें पीछे छूट जाती हैं जिसके लिए लोग शो देखते हैं।

शो का मकसद

किसी शो का मकसद हर उम्र के लोगों को एंटरटेन करना होना चाहिए ताकि परिवार संग भी उस शो का हिस्सा बना जा सके। यह अहम नहीं ​है कि शो का प्रसारण समय क्या है, यह देखना जरूरी है कि क्या इस शो के जरिए हर उम्र और हर वर्ग के लोग एंटरटेन हो पा रहे हैं या फिर एंटरटेनमेंट की भी एक लकीर खींच गई है, इस लकीर के उस पार परिवार है तो इस पार आप। अगर ऐसा है तो समझ लीजिए कि वो एंटरटेनमेंट नहीं बल्कि बंदिश है। बिग बॉस की इस बंदिश में रहकर एंटरटेनमेंट की तलाश कर रहे हैं तो वो मिलना मुश्किल है। एंटरटेनमेंट तो वो होता है जिससे कोई हिचक न हो। अगर हिचक हो रही है तो वो एंटरटेनमेंट नहीं, अश्लीलता है। ऐसे में यह जरूरी है कि बिग बॉस को उस लायक बनाया जाए जिसे परिवार संग देखा जा सके।     

Saturday, 23 September 2017

ताकि 'भरोसे' में न पड़े दरार..

यह महज संयोग ही है कि जब देश के पीएम नरेंद्र मोदी काशी के दौरे पर हैं उसी वक्‍त में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में बेटियां अपने वजूद की लड़ाई  लड़ रही हैं। ऐसे में सवाल है कि पीएम और यहां के सांसद मोदी का रिएक्‍शन क्‍या होना चाहिए? क्‍या उन्‍हें अपने रुट में बदलाव कर लेना चाहिए या फिर वहां जाकर बेटियों के इस मुहिम को बल देना चाहिए। BHU की लड़कियों का दर्द साधारण नहीं है। एक बार के लिए मान लेते हैं कि उनकी पीड़ा सुनने की पीएम मोदी को फुर्सत नहीं है लेकिन राज्‍य के सीएम योगी आदित्‍यनाथ भी क्‍यों खामोश हैं। पिछले दिनों मोदी जी ने जिस तरह ट्रिपल तलाक पर सक्रियता दिखाकर महिलाओं को न्‍याय दिलाया वो बेहद सराहनीय था। लेकिन इस मोर्चे पर इतना कमजोर होने की क्‍या जरूरत थी, ये समझ से परे है।

दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब पीएम मोदी किसी मोर्चे पर अबूझ पहेली बने हैं। इससे पहले भी तमाम ऐसे मुद्दे हैं जिसपर उनका रिएक्‍शन थोड़ी देर या फिर नहीं भी आया है। मीडिया की नजर में शायद खामोशी या फिर रुट बदलना उनका 'मास्‍टर स्‍ट्रोक'हो लेकिन उनके इस रंग से लोगों के भरोसे को सेंध जरूर लग रहा है। मैंने पिछले 3 सालों में तमाम ऐसे लोगों के भरोसे में सेंध लगते देखा है जिन्‍हें कभी यकीं था। कुछ लोगों की नजर में आम जनता का यही भरोसा 'भक्‍त' की संज्ञा दे चुका है। मैं भी उन लोगों की नजर में भक्‍तों में से ही हूं। लेकिन सच भी यह है कि उन भक्‍तों के भरोसे में दरार पड़ रही है। अधिकतर विरोधियों के लिए मोदी सरकार की ज्‍यादा से ज्‍यादा नाकामी ही सुकून देती है, लेकिन जो लोग भरोसा करते हैं उनकी नजर में यह नाकामी सिर्फ एक सवाल है। ये भी जान लीजिए कि उनके लिए यह तब तक सवाल है जब तक कि इसका कोई ठोस जवाब नहीं मिल जाता है। वर्ना वो दिन भी आ जाएंगे जब मोदी सरकार की तुलना भी कांग्रेस के 'काल' से की जाने लगेगी।

आर्थिक मोर्चे पर नाकामी, महंगाई, रोजगार के अवसर की कमी, अपने कठोर फैसलों को जस्टिफाई न कर पाना, बेवजह इवेंटबाजी या बयानबाजी और न जाने क्‍या - क्‍या। ऐसे तमाम मौके आए हैं जब मोदी सरकार ने इसके परिणाम की चिंता नहीं की है। यह ठीक वैसे ही है जैसे कांग्रेस ने 2010 के बाद किया था। कम से कम भाजपा सरकार को कांग्रेस के इस रवैये का परिणाम तो याद ही होगा । 

Monday, 4 September 2017

कंगना से क्रश की वजह..

वैसे तो मेरी बॉलीवुड एक्‍ट्रेसेस से कभी भी, किसी भी तरह की एकतरफा इश्‍कबाजी नहीं रही और न ही मैंने कभी किसी एक्‍ट्रेसेस की कल्‍पना कर अपनी दुनिया को आभासी बनाने की कोशिश की। लेकिन कंगना रनौट के प्रति मेरा ये ज्ञान फेल होता नजर आ रहा है। कंगना रनोत मतलब बेबाक, बेपरवाह, बिंदास और विवादित। फिल्म जगत का ऐसा नाम, जिसे आप पसंद करें या नापसंद, लेकिन नजरअंदाज नहीं कर सकते। मात्र 10 साल में कंगना ने फिल्मों के ग्रंथ पर कभी न मिटने वाली स्याही से छाप छोड़ी है।


मेरी कंगना से क्रश की वजह उनकी हिम्‍मत है। पिछले दिनों कंगना रनौट ने जब इंडिया टीवी के प्रोग्राम आप की अदालत में बोलना शुरू किया तो अच्‍छे – अच्‍छों की बोलती बंद कर दी। हिमाचल के छोटे से शहर की इस बोल्‍ड और बिंदास लड़की की बेबाकी ने मुझे दीवाना बना दिया है। परिवार के खिलाफ कौन सी लड़की बोल पाती है, वो भी दुनिया के सामने..लेकिन कंगना ने बोला भी और परिवारों में भाई-बहन के अंतर को भी परत दर परत खोल दिया. ..दरअसल, 
कंगना बॉलीवुड की उस भीड़ से बिल्‍कुल अलग हैं, जो दोगली जिंदगी जीने में यकीं करती है। वह उन लोगों में से नहीं हैं जो बॉलीवुड के चाटूकारों की श्रेणी में आता है। वह उनमें से हैं जो हर कदम पर बॉलीवुड के उस पिंजरे को चोट पहुंचाती आ रही हैं जिन्‍हें हेमामालिनी, वैजयंतीमाला, माधुरी दीक्षित, श्रीदेवी, काजोल और करीना सरीखी अभिनेत्रियों ने भी तोड़ने की कोशिश नहीं की। कंगना के बिंदास अंदाज को देखकर मुझे बॉलीवुड की जमात बेहद स्‍वार्थी नजर आती है।



करन जौहर से लेकर जावेद अख्‍तर तक   


कंगना ने बॉलीवुड के लगभग हर ताकतवर लॉबी को चुनौती दी है। वर्ना रितिक रोशन जैसे एक्‍टर से टक्‍कर कौन ले सकता है। आदित्‍य पंचोली फिर शेखर सुमन के बेटे अध्‍ध्‍यन और फिर कंगना ने जिस तरीके से बॉलीवुड के बच्‍चा पार्टी को लॉन्‍च करने का ठेका उठाने वाले करण जौहर को ललकारा उसने तो मेरे दिल के तार छेड़ दिए। खासतौर पर करण जौहर वो शख्‍स है जिसको, प्रेस कॉन्‍फ्रेंस से लेकर फिल्‍म प्रमोशन तक बड़ी – बड़ी एक्‍ट्रेसेस खुशामद करती नजर आती हैं। वह यहीं नहीं रुकीं, उन्‍होंने इशारों में बॉलीवुड के टॉप राइटर जावेद अख्तर को भी लपेटे में ले लिया। यह वही वक्‍त था जब कंगना मेरे दिलों दिमाग में घर कर रही थीं।  

हो सकता है आप इसे उनकी आने वाली फिल्‍म सिमरन का प्रमोशन कहें। हो सकता है कंगना कल को बॉलीवुड लॉबी की शिकार हो जाएं। हो सकता है उनको फिल्‍में न मिले। हो सकता है वह बॉलीवुड से बॉयकॉट हो जाएं। हो सकता है, जो हमारी सोच में न हो कुछ ऐसा बुरा हो जाए। लेकिन यह तो तय है कि कंगना की ठसक कभी कम नहीं होने वाली है।     





Wednesday, 30 August 2017

नोटबंदी का लेखा-जोखा : 5 फायदे और 5 नुकसान


नोटबंदी के बाद रिजर्व बैंक ने पहली बार व्‍यापक रूप में आंकड़े जारी किए हैं। आरबीआई ने बुधवार को अपनी एनुअल रिपोर्ट जारी कीजिसके बाद नोटबंदी को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। जहां सरकार इस रिपोर्ट के आधार पर अपनी सफलता गिना रही हैवहीं विपक्ष ने नोटबंदी पर फिर से सवाल खड़े किए हैं। हालांकि एक बात तय है कि नोटबंदी से जहां देश को कई फायदे हुए हैं वहीं कुछ नुकसान भी उठाने पड़े हैं।

आखिर क्‍या था नोटबंदी का लक्ष्‍य

सरकार ने नोटबंदी के दौरान ब्‍लैक मनी पर रोक,आतंकी फंडिंग और नकली नोटों की समस्‍या खत्‍म होने का भरोसा दिलाया था। हालांकि इन मुद्दों पर कितनी सफलता मिली यह कुछ समय बीतने के बाद ही तय होगा।  

इकोनॉमिस्‍ट की नजर में फायदे

ज्‍यादातर इकोनॉमिस्‍ट का मानना है कि इससे पहला फायदा टैक्‍सपेयर्स का दायरा बढ़ने के रूप में सामने आया है। सरकार का इरादा ब्‍लैकमनी को सामने लाना था। जब सारा पैसा सिस्‍टम में आ गया हैतो इसे ब्‍लैकमनी को एक तरह से खत्‍म ही माना जा सकता है। लोगों ने अपना पैसा बैंकों में जमा किया है और बाद में टैक्‍स देना शुरू किया है। सरकार को यह टैक्‍स अब हरदम मिलेगायानी फायदा मिलता ही रहेगा। आंकड़ों के अनुसार पिछले साल 91 लाख नए टैक्‍सपेयर्स बढ़े हैं। इसके पिछले साल की अपेक्षा इनमें 80 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई है।

कर्ज सस्‍ता मिलने का रास्‍ता खुला

दूसरा फायदा बैंकों में अचानक जमा राशि बढ़ने के रूप में सामने आया है। इसके चलते लोगों को कर्ज सस्‍ता मिलने का रास्‍ता खुला है। हाउसिंग लोन पर सभी बैंकों ने अपनी कर्ज की दर को घटा दिया है। पिछले साल हाउसिंग लोन की दरें जहां 10.5 से लेकर 12 फीसदी के बीच थीं वहीं यह अब 8 से 9 फीसदी के बीच आ चुकी हैं।

महंगाई पर लगाम लगी

तीसरा फायदा महंगाई घटने के रूप में सामने आया है। इकोनॉमिस्‍टों के अनुसार ब्‍लैकमनी से लोग अनापशनाप खरीदारी करते हैंजिससे चीजों के दाम बढ़ जाते हैं। लेकिन पूरा पैसा सिस्‍टम में आने से ऐसी चीजें रुकी हैं,जिससे महंगाई पर लगाम लगी है। जहां नवंबर 2016 में यह दर 3.63 फीसदी थीजो जुलाई 2017 में घट कर 2.36 फीसदी पर आ गई।

कैशलैस ट्रांजेक्‍शन में इजाफा

इसके अलावा चौथा फायदा सोसाइटी में कैशलैस ट्रांजेक्‍शन बढ़ने के रूप में सामने आया है। नोटबंदी से सरकार लगातार कैशलैस ट्रांजेक्‍शन बढ़ाने का प्रयास कर रही है। इससे जहां पूरा कारोबार ऑन पेपर हो रहा हैवहीं बाजार में नोटों की जरूरत कम हो रही है। इससे टैक्‍स चोरी रोकने में मदद मिलेगी। रिजर्व बैंक के डाटा के अुनसार नवंबर 2016 से मार्च 2017 के बीच 33 फीसदी ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन बढ़ा है।

नकली नोट छापना मुश्किल

जानकारों की राय में नोटबंदी से पांचवां बड़ा फायदा नकली नोटों को रोकने में मिला है। आतंकी फंडिंग में इन नोटों का बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल होने का आरोप था। सरकार का दावा है कि नोटबंदी के बाद से आंतकी फंडिंग पर ब्रेक लग गया है। 500 और 2000 के नए नोट में सिक्‍युरिटी फीचर बढ़ाए गए हैं। इसके चलते नए नोट नकली छापना कठिन हो रहा है वहीं पुराने नोट बंद होने से यह समस्‍या फिलहाल पूरी तरह से रुक गई है।


नोटबंदी के ये हुए नुकसान


जहां कुछ इकोनॉमिस्‍ट फायदे गिना रहे हैंवहीं इसके नुकसान भी गिनाए जा रहे हैं। जानकारों की राय में पहला नुकसान कंपनियों के कारोबार पर पड़ा। इससे कंपनियों का प्रॉफिट घटा। रेटिंग एजेंसी ICRA की रिपोर्ट के अुनसार वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही में 448 कंपनियों की ग्रोथ में गिरावट दर्ज की गई है। यह इसके एक साल पहले इसी तिमाही में 8.3 फीसदी से घटकर 5.3 फीसदी पर आ गई है। यही नहीं कंपनियों का शुद्द लाभ भी 1.80 फीसदी से घटकर 15.7 फीसदी पर आ गया।

लाखों लोगों की गई नौकरी

वहीं इससे जुड़ा दूसरा नुकसान नौकरियों में कमी के रूप में आया। कंपनियों का जब कारोबार प्रॉफिट घटा तो उन्‍होंने लोगों की छंटनी की। जिससे लाखों लोगों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। CMIE के अनुसार नोटबंदी के बाद से करीब 15 लाख नौ‍करियां गई हैं।

जीडीपी में गिरावट

इसका तीसरा असर देश की जीडीपी में गिरावट के रूप में सामने आया। पिछले साल देश की जीडीपी में गिरावट दर्ज की गई। CSO के डाटा के अनुसार 2016-17 में जीडीपी गिरकर 6.6 फीसदी पर आ गई। यह दर 2015-16 के दौरान 7 फीसदी के ऊपर थी।

ब्‍याज दरों में कमी

चौथा नुकसान लोगों को बैंकों में सेविंग अकाउंट में ब्‍याज दरों में कमी के रूप में सामने आया है। देश में अभी तक कभी भी सेविंग अकाउंट में ब्‍याज दरें नहीं घटीं थींलेकिन अब ज्‍यादातर बड़े बैंक अपने सेविंग में ब्‍याज दरों को आधा फीसदी घटा कर 3.5 फीसदी कर चुके हैं।

गंवानी पड़ी जान

वहीं पांचवां नुकसान ऐसा रहा है जिसकी भरपाई संभव नहीं है। देश में नोटबंदी के दौरान कुछ लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी। यह लोग बैंकों से नई करेंसी लेने के लिए लाइनों में लगे थेजिस दौरान यह हादसे सामने आए। मीडिया रिपोर्ट के अुनसार करीब 90 से ज्‍यादा जानें इस दौरान गईं। 

Thursday, 10 August 2017

गाली देने के लिए ‘सराहा’ सबसे शानदार

आज लगभग हर ऑफ़िस जाने वाला इंसान अपने बॉस की डांट से परेशान रहता है। यही वजह है कि दोनों के बीच रिश्‍तों में कड़वाहट बनी रहती है। कई कर्मचारी तो ऐसे भी होते हैं जिन्‍हें अपने बॉस पर बरसने की इच्‍छा होती है लेकिन जॉब की मजबूरी की वजह से बर्दाश्‍त कर जाते हैं। इसी से परेशान होकर सउदी अरब के सॉफ्टवेयर डेवलेपर जैनुल अलेबदीन तौफिक ने एक ऐप को लॉन्‍च किया।


30 करोड़ बार डाउनलोड
28 साल के तौफिक को इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका ऐप दुनियाभर में फेमस हो जाएगा। करीब एक महीने पहले लॉन्च हुए इस ऐप को दुनियाभर में करीब 30 करोड़ से ज्‍यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है। वहीं भारत में यह ऐप स्टोर पर टॉप ट्रेंड कर रहा है।

बॉस पर भड़ास निकालना मकसद
इस ऐप का नाम ‘सराहा’ है। यह अरबी का शब्‍द है जिसका हिंदी अर्थ ईमानदारी या स्‍पष्‍टता होता है। फाउंडर जैनुल अलेबदीन तौफिक ने फरवरी 2017 में इसका वेबसाइट लॉन्च किया लेकिन जुलाई में इसका ऐप भी बनाया गया। तौफिक ने एक इंटरव्‍यू में बताया कि इस ऐप को बनाने का मकसद उसे अपने बॉस पर अपनी भड़ास निकालना था।

भारत से खास कनेक्‍शन
वेस्‍टर्न सउदी अरब के मेडिना शहर के रहने वाले ऐप के फाउंडर तौफिक ने किंग फाहद यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम से कंम्‍प्‍यूटर साइंस में बैचलर डिग्री की पढ़ाई की है। तौफिक ने भारत की आईटी कंपनी विप्रो लिमिटेड में बतौर जूनियर कंसल्‍टेंट की नौकरी भी की है। इसके अलावा उन्‍होंने सउदी की एक प्राइवेट कंपनी में बिजनेस सिस्‍टम एनालिसिस का जॉब किया।      

इस ऐप की खासियत
इस ऐप के जरिए आप अपने प्रोफाइल से लिंक किसी भी व्यक्ति को मैसेज भेज सकते हैं। लेकिन सबसे दिलचस्‍प पहलू यह है कि मैसेज पाने वाले को यह पता नहीं चलेगा कि ये मैसेज किसने भेजी है। जाहिर है, इसका जवाब भी नहीं दिया जा सकता और यही कारण है कि ये ऐप लोगों के बीच बहुत तेज़ी से लोकप्रिय होता जा रहा है।

कैसे काम करता है ऐप
सबसे पहले अपने स्‍मार्टफोन में प्ले स्टोर से ऐप को डाउनलोड करना होगा। इसके बाद यूजर को रजिस्ट्रेशन कराना होता है। इसके लिए ईमेल आईडी देनी होगी। रजिस्टर्ड होने के बाद इसका लिंक फेसबुक समेत दूसरे सोशल नेटवर्क पर पोस्ट करने का ऑप्शन मिलता है। इस लिंक को पब्लिक कर सकते हैं या प्राइवेट मैसेज के जरिए किसी को भेज सकते हैं। जैसे ही लिंक के जरिए कोई आपको मैसेज भेजता है ऐप में नोटिफिकेशन मिलेगा। हालांकि मैसेज भेजने वाले शख्‍स के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाएगी।  

Monday, 7 August 2017

चोटी नहीं, पंख बचाइए...

पिछले कुछ दिनों से दो खबरों ने लोगों के जेहन में आतंक फैला रखा है। पहली खबर मॉर्डन दौर के इंटरनेट गेम ब्‍लू व्‍हेल की वजह से मौत की जद में जा रहे बच्‍चों से जुड़ी है तो दूसरी खबर महिलाओं की रहस्‍यमयी चोटी काटने की है। इन दोनों खबरों ने लोगों की सोच के डोर को दो छोर पर ला खड़ा किया है। इंटरनेट गेम के जरिए बच्‍चों की मौत ने जहां आधुनिकता को नई चुनौती दे दी है तो वहीं चोटी काटने की घटना ने मॉर्डन इंडिया के मुहिम को सदमा पहुंचा दिया है। इंटरनेट गेम के जरिए जान जाने की घटना किसी भी मायने में कम नहीं हो सकती लेकिन हां, उसे कंट्रोल करने के तमाम उपाय तलाशे जा सकते हैं। लेकिन क्‍या चोटी काटने की घटना को भी उसी की तरह है। मेरा मानना है शायद नहीं। ये सिर्फ चोटी काटने की घटना भर नहीं है, ये लड़कियों या महिलाओं के पर कतरने का जरिया भी बन निकला है। दरअसल, महिलाएं इस भोथरे समाज में लोथड़े से ज्‍यादा नहीं हैं। उनके हर कदम हमारी मर्दनागी को चुनौती देने का काम करती है। तभी तो हवस भरी निगाहों से ही रेप कर दिया जाता है और उससे भी जी न भरे तो जबरदस्‍ती भी कर लेते हैं। दरअसल, महिलाओं को घर से बाहर निकलने नहीं देना और चारदिवारी में समेट कर रखना ही हमारी जीत है। अगर निकले भी तो पूरी तरह से देहाती बनकर ही निकले तभी भला होगा क्‍योंकि मॉडर्न लुक पचाने की हमारे अंदर पाचन शक्ति नहीं है। ऐसे में क्‍यों न ऐसा स्‍वांग रचा जाए, जिसमें डर का माहौल बन जाए और फिर वह घर के अंदर दुबकी रहे। जरूरी नहीं कि चोटी काटने की हर घटना के पीछे का मकसद यही हो लेकिन अधिकतर में यही स्थिति है। 

  यह स्थिति किसी जानलेवा गेम से कहीं ज्‍यादा खतरनाक है। इस स्‍वांग के जरिए महिलाओं का दम घोटनें का काम किया जा रहा है। चोटी कौन काट रहा है, क्‍यों काट रहा है, इसको गंभीरता से लेने की बजाए मजाक का बिषय बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर फनी तस्‍वीरें शेयर की जा रही हैं। इस मजाक के जरिए मामले की गंभीरता को दबाया जा रहा है। गौर से समझिए,  इशारों में महिलाओं और लड़कियों को धमकाया जा रहा है। अगर इस बेहूदा मजाक का हिस्‍सा आप भी हैं तो निश्चित ही महिलाओं की आजादी को कैद करने का काम कर रहे हैं। सरकारें मौन देख रही हैं, मौन देखेंगी भी क्‍योंकि उन्‍हें भी आपके पंख काटने में ही शांति मिलती है। इस सोशल आबोहवा में गुमराह न होइए, इस साजिश को बेनकाब कीजिए और चोटी नहीं अपने पंख को बचाइए।
          

Friday, 28 July 2017

तो होगी शांता की सुनवाई !

अगर कोई सवाल पूछे कि तुम जहां रहते हो उसके पड़ोसी जिले में कितनी बार गए हो तो शायद 99 फीसदी लोगों का जवाब  बहुत बारहोगा। लेकिन मैं उन 1 फीसदी लोगों में से हूं जिनका जवाब 2 से 4 बार होगा। जी हां, मैं अपने जिला सीवान का होकर भी चंद किलोमीटर दूर गोपालगंज बेहद कम गया हूं। यहां मेरे इस कथित पराक्रम का मकसद गोपालगंज की स्थिति से रूबरू कराना है।
दरअसल, जिस दौर में सीवान के हिंदू शहाबुद्दीन के खौफ में जी रहे थे उसी दौर में गोपालगंज में सतीश पांडे ने हिंदुओं के लिए खड़े हुए और उन्‍होंने समय – समय पर शहाबुद्दीन को चुनौती भी दिया। संभवत: यही वजह है कि सतीश पांडे के बाहुबली पराक्रम में लोगों ने उसमें रॉबिन हुड देखा। लेकिन गोपालगंज में भाजपा के दिग्‍गज नेता कृष्‍णा शाही की हत्‍या के बाद से पहली बार सतीश पांडे सवालों के घेरे में हैं। दरअसल, कृष्‍णा शाही की पत्‍नी शांता ने इशारों में ही सतीश पांडे पर आरोप लगा दिया है। उनका कहना है कि परिवार को जदयू विधायक अमरेन्द्र कुमार पाण्डेय उर्फ़ पप्पू पाण्डेय उनके भाई सतीश पांडे और भतीजा मुकेश पांडे से खतरा है। उन्‍होंने इस मामले की सीबीआई जांच कराने की भी मांग कर डाली है। वहीं पुलिस इस हत्‍या को रंजिश और अवैध संबंध से जोड़ कर देख रही है। अहम बात तो यह है कि जिस जेडीयू विधायक पर शांता शाही ने आरोप लगाया है उनकी पार्टी अब भाजपा के साथ सरकार चला रही है। तो ऐसे में यह देखना अहम है कि शांता शाही के मामले में कोई सुनवाई होगी।