Thursday, 10 August 2017

गाली देने के लिए ‘सराहा’ सबसे शानदार

आज लगभग हर ऑफ़िस जाने वाला इंसान अपने बॉस की डांट से परेशान रहता है। यही वजह है कि दोनों के बीच रिश्‍तों में कड़वाहट बनी रहती है। कई कर्मचारी तो ऐसे भी होते हैं जिन्‍हें अपने बॉस पर बरसने की इच्‍छा होती है लेकिन जॉब की मजबूरी की वजह से बर्दाश्‍त कर जाते हैं। इसी से परेशान होकर सउदी अरब के सॉफ्टवेयर डेवलेपर जैनुल अलेबदीन तौफिक ने एक ऐप को लॉन्‍च किया।


30 करोड़ बार डाउनलोड
28 साल के तौफिक को इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका ऐप दुनियाभर में फेमस हो जाएगा। करीब एक महीने पहले लॉन्च हुए इस ऐप को दुनियाभर में करीब 30 करोड़ से ज्‍यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है। वहीं भारत में यह ऐप स्टोर पर टॉप ट्रेंड कर रहा है।

बॉस पर भड़ास निकालना मकसद
इस ऐप का नाम ‘सराहा’ है। यह अरबी का शब्‍द है जिसका हिंदी अर्थ ईमानदारी या स्‍पष्‍टता होता है। फाउंडर जैनुल अलेबदीन तौफिक ने फरवरी 2017 में इसका वेबसाइट लॉन्च किया लेकिन जुलाई में इसका ऐप भी बनाया गया। तौफिक ने एक इंटरव्‍यू में बताया कि इस ऐप को बनाने का मकसद उसे अपने बॉस पर अपनी भड़ास निकालना था।

भारत से खास कनेक्‍शन
वेस्‍टर्न सउदी अरब के मेडिना शहर के रहने वाले ऐप के फाउंडर तौफिक ने किंग फाहद यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम से कंम्‍प्‍यूटर साइंस में बैचलर डिग्री की पढ़ाई की है। तौफिक ने भारत की आईटी कंपनी विप्रो लिमिटेड में बतौर जूनियर कंसल्‍टेंट की नौकरी भी की है। इसके अलावा उन्‍होंने सउदी की एक प्राइवेट कंपनी में बिजनेस सिस्‍टम एनालिसिस का जॉब किया।      

इस ऐप की खासियत
इस ऐप के जरिए आप अपने प्रोफाइल से लिंक किसी भी व्यक्ति को मैसेज भेज सकते हैं। लेकिन सबसे दिलचस्‍प पहलू यह है कि मैसेज पाने वाले को यह पता नहीं चलेगा कि ये मैसेज किसने भेजी है। जाहिर है, इसका जवाब भी नहीं दिया जा सकता और यही कारण है कि ये ऐप लोगों के बीच बहुत तेज़ी से लोकप्रिय होता जा रहा है।

कैसे काम करता है ऐप
सबसे पहले अपने स्‍मार्टफोन में प्ले स्टोर से ऐप को डाउनलोड करना होगा। इसके बाद यूजर को रजिस्ट्रेशन कराना होता है। इसके लिए ईमेल आईडी देनी होगी। रजिस्टर्ड होने के बाद इसका लिंक फेसबुक समेत दूसरे सोशल नेटवर्क पर पोस्ट करने का ऑप्शन मिलता है। इस लिंक को पब्लिक कर सकते हैं या प्राइवेट मैसेज के जरिए किसी को भेज सकते हैं। जैसे ही लिंक के जरिए कोई आपको मैसेज भेजता है ऐप में नोटिफिकेशन मिलेगा। हालांकि मैसेज भेजने वाले शख्‍स के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाएगी।  

Monday, 7 August 2017

चोटी नहीं, पंख बचाइए...

पिछले कुछ दिनों से दो खबरों ने लोगों के जेहन में आतंक फैला रखा है। पहली खबर मॉर्डन दौर के इंटरनेट गेम ब्‍लू व्‍हेल की वजह से मौत की जद में जा रहे बच्‍चों से जुड़ी है तो दूसरी खबर महिलाओं की रहस्‍यमयी चोटी काटने की है। इन दोनों खबरों ने लोगों की सोच के डोर को दो छोर पर ला खड़ा किया है। इंटरनेट गेम के जरिए बच्‍चों की मौत ने जहां आधुनिकता को नई चुनौती दे दी है तो वहीं चोटी काटने की घटना ने मॉर्डन इंडिया के मुहिम को सदमा पहुंचा दिया है। इंटरनेट गेम के जरिए जान जाने की घटना किसी भी मायने में कम नहीं हो सकती लेकिन हां, उसे कंट्रोल करने के तमाम उपाय तलाशे जा सकते हैं। लेकिन क्‍या चोटी काटने की घटना को भी उसी की तरह है। मेरा मानना है शायद नहीं। ये सिर्फ चोटी काटने की घटना भर नहीं है, ये लड़कियों या महिलाओं के पर कतरने का जरिया भी बन निकला है। दरअसल, महिलाएं इस भोथरे समाज में लोथड़े से ज्‍यादा नहीं हैं। उनके हर कदम हमारी मर्दनागी को चुनौती देने का काम करती है। तभी तो हवस भरी निगाहों से ही रेप कर दिया जाता है और उससे भी जी न भरे तो जबरदस्‍ती भी कर लेते हैं। दरअसल, महिलाओं को घर से बाहर निकलने नहीं देना और चारदिवारी में समेट कर रखना ही हमारी जीत है। अगर निकले भी तो पूरी तरह से देहाती बनकर ही निकले तभी भला होगा क्‍योंकि मॉडर्न लुक पचाने की हमारे अंदर पाचन शक्ति नहीं है। ऐसे में क्‍यों न ऐसा स्‍वांग रचा जाए, जिसमें डर का माहौल बन जाए और फिर वह घर के अंदर दुबकी रहे। जरूरी नहीं कि चोटी काटने की हर घटना के पीछे का मकसद यही हो लेकिन अधिकतर में यही स्थिति है। 

  यह स्थिति किसी जानलेवा गेम से कहीं ज्‍यादा खतरनाक है। इस स्‍वांग के जरिए महिलाओं का दम घोटनें का काम किया जा रहा है। चोटी कौन काट रहा है, क्‍यों काट रहा है, इसको गंभीरता से लेने की बजाए मजाक का बिषय बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर फनी तस्‍वीरें शेयर की जा रही हैं। इस मजाक के जरिए मामले की गंभीरता को दबाया जा रहा है। गौर से समझिए,  इशारों में महिलाओं और लड़कियों को धमकाया जा रहा है। अगर इस बेहूदा मजाक का हिस्‍सा आप भी हैं तो निश्चित ही महिलाओं की आजादी को कैद करने का काम कर रहे हैं। सरकारें मौन देख रही हैं, मौन देखेंगी भी क्‍योंकि उन्‍हें भी आपके पंख काटने में ही शांति मिलती है। इस सोशल आबोहवा में गुमराह न होइए, इस साजिश को बेनकाब कीजिए और चोटी नहीं अपने पंख को बचाइए।
          

Friday, 28 July 2017

तो होगी शांता की सुनवाई !

अगर कोई सवाल पूछे कि तुम जहां रहते हो उसके पड़ोसी जिले में कितनी बार गए हो तो शायद 99 फीसदी लोगों का जवाब  बहुत बारहोगा। लेकिन मैं उन 1 फीसदी लोगों में से हूं जिनका जवाब 2 से 4 बार होगा। जी हां, मैं अपने जिला सीवान का होकर भी चंद किलोमीटर दूर गोपालगंज बेहद कम गया हूं। यहां मेरे इस कथित पराक्रम का मकसद गोपालगंज की स्थिति से रूबरू कराना है।
दरअसल, जिस दौर में सीवान के हिंदू शहाबुद्दीन के खौफ में जी रहे थे उसी दौर में गोपालगंज में सतीश पांडे ने हिंदुओं के लिए खड़े हुए और उन्‍होंने समय – समय पर शहाबुद्दीन को चुनौती भी दिया। संभवत: यही वजह है कि सतीश पांडे के बाहुबली पराक्रम में लोगों ने उसमें रॉबिन हुड देखा। लेकिन गोपालगंज में भाजपा के दिग्‍गज नेता कृष्‍णा शाही की हत्‍या के बाद से पहली बार सतीश पांडे सवालों के घेरे में हैं। दरअसल, कृष्‍णा शाही की पत्‍नी शांता ने इशारों में ही सतीश पांडे पर आरोप लगा दिया है। उनका कहना है कि परिवार को जदयू विधायक अमरेन्द्र कुमार पाण्डेय उर्फ़ पप्पू पाण्डेय उनके भाई सतीश पांडे और भतीजा मुकेश पांडे से खतरा है। उन्‍होंने इस मामले की सीबीआई जांच कराने की भी मांग कर डाली है। वहीं पुलिस इस हत्‍या को रंजिश और अवैध संबंध से जोड़ कर देख रही है। अहम बात तो यह है कि जिस जेडीयू विधायक पर शांता शाही ने आरोप लगाया है उनकी पार्टी अब भाजपा के साथ सरकार चला रही है। तो ऐसे में यह देखना अहम है कि शांता शाही के मामले में कोई सुनवाई होगी।

Sunday, 9 July 2017

बिजनेस की पिच पर भी ‘मास्‍टर’ हैं गावस्‍कर

 क्रिकेट इतिहास में सुनील गावस्‍कर किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। गावस्‍कर लगभग 45 सालों से भारतीय क्रिकेट से किसी न किसी तरह जुड़े हैं। उनके क्रिकेट रिकॉर्ड से लेकर शैली तक की चर्चा आज भी होती रहती है। बहुत कम ही लोग जानते हैं कि क्रिकेट दुनिया के लिटिल मास्‍टररहे गावस्‍कर ने बिजनेस की दुनिया में भी खूब नाम कमाया है। सुनील गावस्‍कर क्रिकेट कैरियर के समय में ही बिजनेस की दुनिया में कूद पड़े थे।
  
 उन्‍होंने एडवरटाइजिंग प्रोफेशनल सुमेध शाह के साथ मिलकर 1985 में प्रोफेशनल मैनेजमेंट ग्रुप (पीएमजी) नामक कंपनी बनाई थी। यह भारत की पहली स्‍पोर्ट्स मार्केटिंग कंपनी थी। पीएमजी भारत की एकमात्र ऐसी कंपनी है जो स्‍पोर्ट्स के क्षेत्र में अलग अलग तरह की सर्विस देती है। यह कंपनी हॉकी, बैडमिंटन, पोलो और फुटबॉल समेत अन्‍य गेम्‍स में एक्टिव है। यह कंपनी पिछले 30 सालों से ज्‍यादा समय से अलग अलग स्‍पोर्ट्स के लिए इवेंट और मीडिया मैनेजमेंट का काम करती आ रही है। इसमें क्रिकेट अवार्ड्स, स्‍पॉन्‍सरशिप और कंसल्‍टींग जैसा काम शामिल है। वर्तमान में यह कंपनी सैम बलसारा की एड एंड पीआर एजेंसी मैडिसन वर्ल्‍ड का हिस्‍सा बन गई है।
   गावस्‍कर की इस कंपनी से भारतीय टीम के ओपनर शिखर धवन, सरफराज अहमद और हॉकी कप्‍तान रहे सरदार सिंह जैसे बड़े नाम जुड़े हैं। ये कंपनी इन प्‍लेयर्स के कमर्शियल और मैनेज्‍मेंट का काम देखती है। 1987-88 में  'सुनील गावस्‍कर प्रेजेंटनाम से पहला स्‍पोर्ट्स प्रोग्राम दूरदर्शन पर दिखाया गया था।  इंटरनेशनल क्रिकेटर ऑफ द ईयर अवार्ड की भी शुरुआत इसी कंपनी ने की थी। इस कंपनी ने गोल्‍फ के लिए भी कई अहम इवेंट लॉन्‍च किए।




Thursday, 22 June 2017

टेलिकॉम कंपनियां दे रही हैं भारी डिस्‍काउंट, आप भी उठाएं फायदा


नई दिल्‍ली। वैसे तो टे‍लिकॉम इंडस्‍ट्री में रिलायंस जियो की एंट्री के बाद से ही फ्री सर्विसेज और डिस्‍काउंट का दौर चल निकला है। एयरटेल, वोडाफोन समेत लगभग सभी बड़ी टेलिकॉम कंपनियों ने फ्री कॉलिंग, मैसेज और फ्री डाटा जैसे ऑफर दे रही हैं। यही नहीं, कंपनियां अगल – अलग तरीके से भी कस्‍टमर्स को ऑफर दे रही हैं। इन ऑफर्स को पोस्‍टपेड और प्रीपेड कस्‍टमर्स खूब एंज्‍वॉय कर रहे हैं। किसी भी टेलिकॉम कंपनी के प्रीपेड कस्‍टमर्स के लिए अच्‍छी बात होती है कि वह अपने सुविधा के अनुसार प्‍लान रिचार्ज करते हैं और फ्री सर्विसेज का फायदा उठाते हैं।


हालांकि पोस्‍टपेड कस्‍टमर्स के साथ ऐसा नहीं है। दरअसल, पोस्‍टपेड कस्‍टमर्स इस फ्री सर्विसेज को एंन्‍ज्‍वॉय तो करते हैं, उसके एवज में कस्‍टमर्स को एक्टिव कराए गए प्‍लान के महंगे मंथली चार्ज (रेंटल ) हर हाल में देने ही पड़ते हैं। लेकिन क्‍या आपको पता है, फ्री सर्विसेज जारी रखते हुए भी कंपनियां मंथली चार्ज में डिस्‍काउंट देती हैं। आज हम आपको उसी तरीके के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके जरिए रेंटल में  डिस्‍काउंट ले सकते हैं।   

कैसे ले सकते हैं डिस्‍काउंट
दरअसल, टेलिकॉम कंपनियां इन दिनों अपने कस्‍टमर्स को लुभाने और नेटवर्क के साथ बरकरार रखने के लिए हर तरह के हथकंडे अपना रही हैं। कस्‍टमर्स को अलग – अलग तरह की बेनिफिट दी जा रही हैं। इसी के तहत कंपनियां पोस्‍टपेड कस्‍टमर्स को रेंटल तक में डिस्‍काउंट दे रही हैं।  

कॉल या मैसेज से उठाएं फायदा

हमें कई ऐसे कस्‍टमर्स मिले हैं जिन्‍हें कस्‍टमर केयर में कॉल करने या फिर पोर्ट का मैसेज डालने पर कंपनी की ओर से रेंटल में डिस्‍काउंट दे दिया गया है। हालांकि इस मामले में टेलिकॉम कंपनियां खुलकर कुछ बोलने से बच रही हैं। लेकिन वह इस बात से भी सहमत हैं कि अपने पुराने और ईमानदार कस्‍टमर्स को अपने नेटवर्क में बनाए रखने के लिए डिस्‍काउंट दिया जाता है।    

कैसे ले सकते हैं डिस्‍काउंट

कुछ कस्‍टमर्स का दावा है कि उन्‍होंने कस्‍टमर केयर में कॉल करने के बाद सीनियर अधिकारियों से नेटवर्क छोड़ने की बात कही तो उन्‍हें तमाम फ्री सर्विसेज को बरकरार रखते हुए किफायती ऑफर दिया गया। वहीं कुछ कस्‍टमर्स ने बताया कि जब उन्‍होंने PORT का मैसेज 1900 पर भेजा उसके बाद कंपनी की ओर से कॉल आया और उन्‍हें डिस्‍काउंट रेंटल के साथ कई आकर्षक ऑफर दिए गए।  




Tuesday, 20 June 2017

एक लीजेंड का यूं जाना..

करीब एक साल पहले की बात है , अनिल कुंबले टीम इंडिया के कोच बने थे। दिल से मुझे खुशी हुई लेकिन आज जब उन्‍होंने टीम के कोच पद छोड़ा है तो बेहद आहत हूं। दरअसल, अनिल कुंबले ने बतौर खिलाड़ी , बतौर कोच एक लड़ाके की भूमिका निभाई। कुंबले की छवि फिरोजशाह कोटला में 74 रन देकर दस विकेट लेने वाले लेग स्पिनर या विवादास्‍पद 'मंकीगेट' सीरीज के दौरान ऑस्‍ट्रेलिया में आगे बढ़कर लीडरशिप करने से ज्‍यादा है। अगर कुंबले के कोच पद से इस्तीफा देने की वजह कुंबले से विवाद है या फिर पाकिस्तान के खिलाफ फाइनल में मिली हार की वजह से उन्हें यह पद गंवाना पड़ा है तो दोनों ही स्थितियों में उनके साथ अन्यया हुआ है।
लंबे समय तक मूंछे रखने और सज्जन से दिखने वाले कुंबले ने इंजीनियरिग की पढ़ाई की है। वह मैदान के बाहर भी और अंदर भी किसी इंजीनियर सरीखे ही दिखते हैं, सीधे और भोले से। चेहरे से भोले दिखने वाले अनिल कुंबले बतौर गेंदबाज कितने 'दबंग' रहे हैं?, जिन्होंने उनके सामने बल्लेबाजी की है, वो सब समय - समय पर बताते रहे हैं। कुंबले के रिकॉर्ड और उनकी शख्सियत के बारे में क्रिकेट की समझ रखने वाला हर इंसान जानता है लेकिन बहुत कम लोग इस रोचक तथ्य को जानते होंगे कि 6.2 इंच के अनिल के नाम के साथ लगा 'कुंबले' उनकी जाति नहीं बल्कि गांव का नाम है। बंगलोर में जन्में, कुंबले को कम उम्र से ही क्रिकेट में रूचि पैदा हो गई थी। वह बी एस चंद्रशेखर जैसे क्रिकेटरों का खेल देखते हुए बडे हुए। कुंबले का वैवाहिक जीवन भी बेहद ही दिलचस्प रहा है। उनका दिल तलाकशुदा चेतना पर आया। चेतना की पहले पति से एक बेटी आरुनी  भी थी लेकिन कुंबले ने उसे हाथों हाथ लिया और 1999 में शादी कर ली। शादी के बाद उनके दो बच्चे, बेटा मायस कुंबले और बेटी स्वास्ती हुए।  कुंबले ने अपने सम्मान और त्याग को टीम और परिवार के हित से ऊपर कभी नहीं रखा। जब जरूरत पड़ी तो उन्होंने पत्नी चेतना के लिए उनके पहले पति से कानूनी लड़ाई भी लड़ी । यह लड़ाई बेटी को हासिल करने की थी। कुंबले ने इस लड़ाई में चेतना का हर कदम पर साथ दिया और उनकी शख्सियत के मुताबिक उन्हें जीत भी मिली। कोई यह कैसे भूल सकता है जब वेस्टइंडीज में भारत का मैच हो रहा था। उस वक्त कुंबले को पहले कहा गया कि वो मैच में खेल रहे हैं, फिर कहा गया कि नहीं खेल रहे हैं, फिर दोबारा से कहा गया कि खेल रहे हैं।  कुंबले जिंक का पेंट लगाकर मैदान का चक्कर काट रहे थे। आख़िरकार जब टीम की घोषणा हुई तो उसमें कुंबले का नाम नहीं था। एक सीनियर खिलाड़ी के साथ इस तरह का बर्ताव हुआ, लेकिन जब भारत टेस्ट मैच जीत गया तो सबसे अधिक खुश जो खिलाड़ी था वो थे अनिल कुंबले। उस वक्त वो अपने कैमरे से पूरी टीम की खुशी मनाते हुए फोटो खींच रहे थे। कुंबले के साथ यह हरकत कप्तान सौरव गांगुली ने की थी फिर भी वह कुंबले को 'जेंटलमैन' कहते हैं क्योंकि उन्हों ने कभी निजी मनमुटाव को सामने नहीं आने दिया।

Monday, 19 June 2017

13 की उम्र में बिहार की इस महिला ने छोड़ा स्कू्ल, आज है ब्रिटेन की बिजनेसवुमन

नई दिल्‍ली। जरा सोचिए, जब किसी लड़की को 13 साल की उम्र में शादी के लिए पढ़ाई छोड़ने को मजबूर किया गया होगा तब उस पर क्‍या गुजरी होगी। ऐसी स्थिति में आमतौर पर लड़कियां पढ़ाई को बहुत पीछे छोड़ देती हैं और फिर उनका पूरा ध्‍यान परिवार पर हो जाता है। लेकिन बिहार के सीतामढ़ी की आशा खेमका उन लड़कियों में से नहीं थीं। सिर्फ 15 साल की उम्र में शादी होने के बाद उन्‍होंने 36 साल की उम्र में अपनी पहली डिग्री लेने का फैसला और आज ब्रिटेन के सबसे बड़े कॉलेजों में शुमार वेस्ट नॉटिंघमशायर कॉलेज की सीईओ और प्रिंसिपल हैं। आशा खेमका को हाल ही एशियन बिजनेसवुमन ऑफ द ईयर का खिताब दिया गया है। आइए जानते हैं, आशा खेमका की सक्‍सेस स्‍टोरी के बारे में  


बिहार से ब्रिटेन का सफर
मां की मौत के बाद आशा खेमका की शादी हो गई, तब उनकी उम्र सिर्फ 15 साल थी। शादी के करीब 11 साल बाद खेमका जिंदगी में बड़ा बदलाव आया। दरअसल, जब वह 26 साल की थीं तभी उनके डॉक्टर पति शंकर अग्रवाल ने इंग्‍लैंड में नौकरी पक्की कर ली थी। फिर वो अपने पति के पास अपने बच्चों के साथ ब्रिटेन पहुंचीं।

अंग्रेजी बनी सबसे बड़ी मुसीबत
इंग्‍लैंड आने के बाद हिंदी इलाके की आशा खेमका के लिए सबसे बड़ी मुसीबत अंग्रेजी बनी लेकिन कॉन्फिडेंस कम नहीं हुआ। यहां उन्‍होंने टूटी-फूटी अंग्रेजी में साथी महिलाओं से बात करना शुरू किया।  कुछ सालों बाद कैड्रिफ यूनिवर्सिटी से बिजनेस मैनजमेंट की डिग्री ली। एक इंटरव्‍यू में खेमका ने बताया था कि अंग्रेजी में कमजोर होने की वजह से पढ़ाई के दौरान वह प्रोजेक्‍ट अपने बच्‍चों से बनवाती थीं। और टीवी पर बच्चों के लिए आने वाले शो को देखकर अंग्रेजी सीखती थीं।

ऐसे बन गईं प्रिंसिपल
पढ़ाई पूरी करने के बाद आशा ऑस्‍वेस्‍ट्री कॉलेज में पढ़ाने लगीं। अपने छात्रों की फेवरेट टीचर थीं। इसके बाद ब्रिटेन के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार वेस्ट नॉटिंघमशायर कॉलेज में लेक्‍चरर बन गईं। दिलचस्‍प बात यह है कि आज वह इसी कॉलेज की सीईओ और प्रिसिंपल हैं।

मिला ब्रिटेन का सबसे बड़ा सम्‍मान
आशा को 2008 में ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायरसे सम्मानित किया गया।  2013 में ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'डेम कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश अंपायर' का सम्मान से नवाजा गया था। उनसे पूर्व ये सम्मान किसी भारतीय मूल के शख्स को 1931 में मिला था। तब धार स्टेट की महारानी लक्ष्मी देवी बाई साहिबा को ये डेम पुरस्कार प्राप्त हुआ था।